करतारपुर के बहाने पाक की कूटनीति

पुष्परंजन

हर क्रिया की प्रतिक्रिया देने में पाकिस्तान देर नहीं करता। सार्क सम्मेलन में शामिल होने के प्रस्ताव को ठुकराये जाने के बाद पाकिस्तानी अखबार द डॉन ने ‘भारत का कट्टरवादी रुख’ शीर्षक से संपादकीय लिखा है। इसमें एक ही राग है कि पाकिस्तान, ‘पीपुल टू पीपुल कॉन्टेक्ट’ की राह पर है, मगर भारत में जिस पार्टी का शासन है, उसका रुख नरम नहीं है। सत्तारूढ़ दल, भारत सरकार के हर फैसले पर सवार है। संपादकीय में उस आतंकवाद की एक लाइन भी नहीं की है, जो इस इनकार की वजह है।
इमरान खान के सौ दिन पूरे होने के मौके पर पाकिस्तान का एक दूसरा प्रमुख दैनिक ‘द न्यूज’ ने वजीरे आजम द्वारा किये संकल्पों से पलट जाने के पचास उदाहरण गिनाये हैं। पचासवें नंबर पर अखबार ने याद दिलाया कि चुनाव के समय मोदी को कड़ाई से निपटने का अहद इमरान खान ने किया था। मगर, ये हैं कि शांति प्रस्तावों के जरिये घुटने टेके जा रहे हैं। लेकिन, भारत-पाक संबंधों की जिस राह पर अग्रसर चलने की कोशिश सौ दिनों में हुई है, उसमें पाक सेना की सहमति भी रही है। इमरान जब करतारपुर में यह कहते हैं कि सरकार और सेना एक ही ‘पेज’ पर है, तो बात समझ में आ जाती है कि किस रणनीति की ओर पाक का नया निजाम अग्रसर है। जब इमरान ने गद्दी संभाली पाकिस्तान के पास पैसे नहीं थे। पीएमओ की कारें बिक गईं। भैंसें नीलाम हो गईं। ताज्जुब है, खजाना खाली सरकार रावी नदी पर 800 मीटर लंबा पुल, साढ़े चार किमी लंबी सडक़, बॉर्डर से लगी 300 मीटर की ट्रैक, दस हजार दर्शनार्थियों के रुकने के वास्ते गेस्ट हाउस, पार्किंग, अस्पताल, दुकानें बनाएगी। सब कुछ नवंबर, 2019 तक तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सरकार के पास पैसा अचानक कहां से आ गया? कौन लोग दे रहे हैं? ब्रिटेन से या कनाडा से? सोर्स का पता चले, तो मकसद का भी खुलासा हो जाएगा। यह तो मानी बात है कि जिनमें सिख पंथ के प्रति अगाध श्रद्धा है, वे दान के वास्ते सबसे आगे होंगे। करतारपुर साहिब के वास्ते संगे बुनियाद समारोह के पहले लाहौर में खालिस्तान के बैनर, उसके समर्थन में नारे को इमरान सरकार चाहती तो रोक देती। पाक सेना प्रमुख जनरल बाजवा खालिस्तान समर्थक नेता गोपाल चावला से मिलने से परहेज कर सकते थे। समारोह स्थल पर चावला के साथ मुलाकात की तस्वीरें किनके लिये वायरल की गईं? जाहिर-सी बात है, कनाडा-ब्रिटेन में अलगाववाद के सपने पाले जो लोग बैठे हैं, उनसे भी धन उगाही व छिपे एजेंडों के वास्ते इस तरह की तस्वीरें काम आती हैं। ऐसे में सार्क का न्योता स्वीकार करने का मतलब था, 2019 के वास्ते विपक्ष की झोली में एक विवादित विषय डाल देना।
सरकार को सिख वोट बैंक भी दिख रहा था, जिसके सरमायेदार सिद्धू न बन जाएं, उसे भी रोकना था। मगर, जिस तरह से सरकार के दो मंत्री हरसिमरत कौर बादल और हरदीपपुरी करतारपुर में उपेक्षित से थे, वह भी विदेश मंत्रालय के लिए खलिश का एक कारण तो बन ही रहा था। बुधवार का पूरा दिन पंजाब में सिख वोट बैंक की सियासत करने वालों के लिए क्रेडिट लेने की होड़ में गुजर गया। मगर, क्या करतारपुर के सवाल पर केंद्र सरकार कुछ अजीब-सी कन्फ्यूजन वाली स्थिति में नहीं रही है? मई, 2017 में मोदी सरकार की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ने यह फैसला लिया कि करतारपुर तक हम पुल या गलियारा नहीं बनायेंगे, बल्कि सीमा पर दूरबीन फिट करा देते हैं, जहां से श्रद्धालु दर्शन कर लिया करेंगे। ऐसा किया भी। इस फैसले का कारण घुसपैठ को रोकना और कहीं न कहीं खालिस्तान की जड़ें पनपने से रोकना भी था। मगर, यही सरकार डेढ़ साल बाद कॉरिडोर के वास्ते तैयार हो जाए, तो सवाल पूछने वाले कहां चूकेंगे?
पाकिस्तान में प्राचीन गुरुद्वारे कई सारे हैं मगर, दुनियाभर के सिखों के लिए दो गुरुद्वारे सर्वाधिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। पहला गुरुद्वारा ननकाना साहिब, जहां गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ था और दूसरा पवित्र करतारपुर गुरुद्वारा है, जहां उन्होंने देह त्याग किया था। सीमा पर होने की वजह से करतारपुर साहिब गुरुद्वारा भारत-पाक कूटनीति को लगातार प्रभावित करता रहा है। नवंबर, 2019 में गुरु नानकदेव जी की 550वीं जयंती है। दिलचस्प है कि पाकिस्तान की कैबिनेट ने जयंती के वास्ते प्रस्ताव पास किया, इधर 22 नवंबर, 2018 को मोदी कैबिनेट ने भी इस जयंती को ग्लोबल लेबल पर मनाने का प्रस्ताव पास किया है।
तो क्या दोनों तरफ इसकी कोशिश हो रही थी कि देव नीति के बहाने, कूटनीति के बर्फ को पिघलाया जाये? चिंता वाली बात है यह कि इस करतारपुर गलियारे के खुल जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों का काम बढ़ जाएगा। पंजाब में अतिवादियों के 19 मॉड्यूल अब तक पकड़े जा चुके हैं। इनमें से दो मॉड्यूल ऐसे थे, जिनमें कश्मीरी छात्र थे!

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