ऐतिहासिक संघर्षों की दास्तान आईएनए वार म्यूजियम

मणिपुर से लौट कर

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की स्मृतियों, उनके ऐतिहासिक साक्ष्यों को सहेजने, बचाने को लेकर सरकारी उदासीनता बेहद चौंका देती है। आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडर की स्मृतियों को संभाल और सहेज कर रखा है, उनके संघर्षों के गवाह, उनकी संघर्षभूमि मणिपुर राज्य के एक छोटे शहर मोएरेंग ने। इतिहास गवाह है इसी परिसर में नेताजी ने 14 अप्रैल, 1944 में तिरंगा झंडा लहराया था। इसी शहर में इंडियन नेशनल आर्मी का हेड क्वार्टर भी था जहां देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने की सारी योजनाएं बनती थीं और उन पर अमल किया जाता था। वहीं बैठ कर नेताजी ने आजाद भारत का स्वप्न देखा था। वह परिसर अब भी सलामत है, उसे वार म्यूजियम में बदल दिया गया है। स्थानीय लोगों ने अपनी कोशिशों से इतिहास को बचा रखा है।

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