जिद… सच की सडक़ हादसों में होती मौतें और लचर तंत्र

सवाल यह है कि सडक़ हादसों की वजहें क्या हैं? क्या प्रदेश में चलाये जा रहे सडक़ सुरक्षा जागरूकता अभियान का कोई असर नहीं पड़ रहा है? क्या बदहाल यातायात व्यवस्था, गड्ढा युक्त सडक़ें और तेज रफ्तार हादसों के लिए जिम्मेदार हैं? क्या नशे और गाड़ी चलाते समय मोबाइल के प्रयोग ने हादसों में इजाफा किया है? क्या इन हादसों को कम नहीं किया जा सकता है?

Sanjay Sharma

लखनऊ में डंपर ने स्कूटी सवार दो युवकों रौंद दिया, जिससे उनकी मौत हो गई। यह हादसा बानगी भर है। सच यह है कि प्रदेश में सडक़ हादसों से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। यहां रोज हादसों में किसी न किसी की मौत हो रही है। लोग जख्मी हो रहे हैं। वहीं लचर सरकारी तंत्र इस मामले में कोई व्यावहारिक पहल करता नहीं दिख रहा है। अहम सवाल यह है कि सडक़ हादसों की वजहें क्या हैं? क्या प्रदेश में चलाये जा रहे सडक़ सुरक्षा जागरूकता अभियान का कोई असर नहीं पड़ रहा है? क्या बदहाल यातायात व्यवस्था, गड्ढा युक्त सडक़ें और तेज रफ्तार हादसों के लिए जिम्मेदार हैं? क्या नशे और गाड़ी चलाते समय मोबाइल के प्रयोग ने हादसों में इजाफा किया है? क्या इन हादसों को कम नहीं किया जा सकता है? क्या जागरूकता के अभाव ने स्थितियों को और बिगाड़ दिया हैï? क्या सुव्यवस्थित यातायात व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है?
प्रदेश में रोजाना सडक़ हादसे हो रहे हैं। अकेले राजधानी में होने वाले सडक़ हादसों में हुई मौतों के आंकड़ें चिंतित करने वाले हैं। वर्ष 2016 में राजधानी में 1519 हादसे हुए थे। इन हादसों में 652 लोगों की मौत हुई। वर्ष 2017 में यहां 1539 सडक़ हादसे हुए, जिसमें 642 लोगों की मौत हो गई। वहीं इस वर्ष हादसों में मरने वालों का आंकड़ा 400 पार कर चुका है। हादसों की सबसे बड़ी वजह बदहाल यातायात व्यवस्था है। प्रदेश के अधिकांश शहरों में यातायात नियमों का पालन कड़ाई से नहीं किया जाता है। सिग्नल सिस्टम चौपट हो चुके हैं। जहां सिग्नल नहीं है उन चौराहों पर टै्रफिक पुलिस के जवान अक्सर नदारद रहते हैं। ये यातायात को नियंत्रित करने से अधिक दिलचस्पी ओवरलोड वाहनों से वसूली में लेते हैं। लिहाजा यातायात नियमों की धज्जियां उडऩे लगती हैं। सडक़ों की बनावट भी हादसों को न्योता दे रही है। प्रदेश की तमाम सडक़ें जर्जर हैं। इन पर गड्ढे हैं। ऐसी सडक़ें, जिन पर अधिकतम गति सीमा 60 किमी तय है, उन पर गड्ढे जानलेवा साबित हो रहे हंै। वाहनों की गति को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए स्पीड ब्रेकर बिना मानकों के बने हैं। ये वाहनों की स्पीड रोकने की जगह हादसों को बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा अप्रशिक्षित ड्राइवर, नशे और मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चलाना भी हादसों का कारण बन रहे हैं। यदि सरकार हादसों को कम करना चाहती है तो उसे न केवल सडक़ों को मानकों के मुताबिक दुरुस्त करना होगा बल्कि यातायात के नियमों का कड़ाई से पालन कराना भी सुनिश्चित करना होगा। इसके अलावा लोगों के बीच सतत जागरूकता अभियान चलाना होगा।

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