इतिहास दोहराने की कोशिश

अजय साहनी

अमृतसर में राजासांसी इलाके में निरंकारी भवन पर हुआ आतंकवादी हमला आतंक फैलाने की नापाक कोशिशों का परिणाम है। यह कोशिशें बहुत पुरानी हैं, जिसके पीछे निस्संदेह पाकिस्तान का हाथ है। क्योंकि खालिस्तानी आतंकियों के नेतृत्वकर्ताओं का आधार आज भी पाकिस्तान में बना हुआ है। पाकिस्तान ने ही इन आतंकियों को पनाह दे रखी है, उन्हें हथियार व फंडिंग उपलब्ध कराता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा देता है और समर्थन करता है। पाकिस्तान विदेशों में रहने वालों प्रवासी खालिस्तानी तत्वों को भारतीय जमीन पर गतिविधियों के साथ तालमेल बनाये रखने के लिए लगातार पैसे खर्च करता रहा है।
इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ये खालिस्तानी तत्व सक्रिय हैं तथा यह आतंकी हमला खालिस्तानी अभियान को जिंदा करने की खालिस्तानियों और पाकिस्तान की मंशा का ही नतीजा है। सामान्यतया, इस तरह की नापाक कार्रवाइयां असफल ही रही हैं। अक्सर यह देखने में आता है कि बीच-बीच में इस तरह की इक्का-दुक्का आतंकी कोशिशें होती हैं, इन हादसों में लोगों की जान जाती है, ‘टार्गेटेड किलिंग्स’ भी होती हैं और जांच के दौरान इसमें शामिल लोगों की धर-पकड़ कर ली जाती है व केस सुलझ जाता है। पहले के हमलों में शामिल भारत में सक्रिय आतंकियों को पकड़ा भी जा चुका है। कहने का अर्थ यही है कि हमारी एजेंसियों द्वारा सख्त कदम उठाये जाते रहे हैं और यह खालिस्तानी आतंकी अभियान कभी बढऩे नहीं दिया गया।
निरंकारियों पर हुए हालिया हमले के बाद जो बहस चल रही है, उसमें गलतबयानी की जा रही है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह हमला आईएस (इस्लामिक स्टेट) ने किया है, वहीं दूसरे लोग इसमें जैश-ए-मोहम्मद का हाथ बता रहे हैं। लेकिन, मुझे कहीं से भी ऐसा नहीं दिखता है कि आईएस या जैश-ए-मोहम्मद के लोग यहां आकर खालिस्तानियों के पारंपरिक शत्रु निरंकारियों के खिलाफ कोई ऐसा ऑपरेशन चलायेंगे। इस्लामिक स्टेट का कश्मीर में ही कोई मजबूत आधार नहीं रहा है। यह एक छोटा सा गुट है, जो हिज्बुल मुजाहिद्दीन से झगड़ा होने के बाद बना था। इसमें 12-15 लडक़े थे, जिसमें आधे मारे जा चुके हैं। ये लडक़े वहां से भागकर, यहां निरंकारियों पर हमले करने नहीं आयेंगे, अगर उन्हें ‘शहीद’ ही होना है, तो कश्मीर में ही होंगे। अगर यह लडक़े अंतरराष्ट्रीय आईसिस से जुड़े हुए हों, तो भी वह यहां हमले क्यों करेंगे, वे पाकिस्तान से इजाजत लेकर काम तो करते नहीं है।
हाल में आयी रिपोर्ट में, जिसमें कहा गया था कि जैश-ए-मोहम्मद के तीन-छह लडक़ों की टीम पंजाब में है, और कहा गया कि जाकिर मूसा भी वहां देखा गया है, इन रिपोर्टों से कोई हासिल नहीं निकलता। इस आतंकी हमले के सारे संकेत खालिस्तानी तत्वों की तरफ ही इशारा करते हैं। भिंडरावाला के पुराने अभियानों को ही देख लें, तो उसमें लगातार निरंकारियों के खिलाफ चलाये मुहिमों का इतिहास दिखायी देता है। यह हमला उन्हीं अभियानों को दोहराने की आतंकी कोशिश है, जिसके तार प्रवासी खालिस्तानी आतंकी तत्वों से जाकर जुड़ते हैं। यह तत्व भारत से बाहर रहकर इस तरह के अभियानों को अंजाम दे रहे हैं। भारतीय राजनीति में हितों के हिसाब से मामलों को राजनीतिक एंगल दिया जाता है। आज देशभर में हर चीज को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से दिखाने की कोशिश की जा रही है। पहले भी यही होता था कि दो लडक़े मोटरसाइकिल से आये और गोली मार दी। इस बार ग्रेनेड चलाया है। पैटर्न द्वारा यह पहचानना मुश्किल नहीं कि इसके पीछे कौन है। प्रोजेक्ट की तरह चल रही ध्रुवीकरण की यह गंदी राजनीति कहीं भी मुस्लिम नाम घुसेडऩे की चाहत रखती है। यह कोशिश हमारी एजेंसियों के काम में बाधा पहुंचाती है। इस वक्त फर्जी की बहस से बचना चाहिए। जब तक तथ्यों पर आधारित जांच न आए कोई भी राय बनाने से बचें। हमारे आर्मी चीफ बिपिन रावत को हर मुद्दे पर बयान देने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें को राजनीतिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। पंजाब में उन्हेें किसी भी तरह के बयान देने की जरूरत नहीं थी। वे खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ जारी अभियानों में कोई भूमिका नहीं निभा रहे, न ही यहां फौज की कोई टुकड़ी ‘एंटी टेरर ऑपरेशन’ में शामिल है। कश्मीर या उत्तर-पूर्व, जहां फौज हर वक्त जमी रहती है, वहां के मामलों में वह बोलें तो भी मैं एतराज करूंगा।
पंजाब तो कोई कश्मीर या नार्थ-ईस्ट भी नहीं है। हालांकि, उन्होंने काफी हद तक सही कहा था कि पंजाब में आतंकवाद लगभग साफ हो चुका है। हां, एक खतरा बना हुआ है और अलर्ट रहने की जरूरत बनी हुई है। लेकिन फिर भी, आर्मी चीफ को इस तरह के सार्वजनिक बयान नहीं देने चाहिए। फिलहाल पाकिस्तान से सहयोग मिलने के बावजूद, खालिस्तानियों की इतनी हैसियत नहीं है कि वह इन छोटे-मोटे कायराना हमलों के अतिरिक्त, जनता के बड़े हिस्से पर बुरी नजर डाल सके।

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