जिद… सच की पंजाब में आतंकवाद की आहट के मायने

सवाल यह है कि क्या पंजाब में 40 साल बाद एक बार फिर आतंकवाद की आहट सुनाई देने लगी है? सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत और खुफिया एजेंसियों की आशंका के बावजूद राज्य सरकार ने कोई कड़े कदम क्यों नहीं उठाए? पंजाब पुलिस ने खुफिया सूचना को इतने हल्के में कैसे ले लिया? क्या पंजाब सरकार ने मान लिया था कि अब राज्य में आतंकी घटनाएं संभव नहीं हैं?

Sanjay Sharma

पंजाब में एक बार फिर आतंकवाद की आहट सुनाई देने लगी है। राज्य के अदलीवाल गांव में स्थित निरंकारी भवन में सत्संग के दौरान बाइक सवार दो आतंकियों ने ग्रेनेड से हमला किया। हमले में तीन लोगों की मौत हो गई जबकि 22 से ज्यादा घायल हो गए। अभी तक की जांच से साफ है कि हमले को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर खालिस्तानी आतंकियों ने अंजाम दिया है। सवाल यह है कि क्या पंजाब में 40 साल बाद एक बार फिर आतंकवाद की आहट सुनाई देने लगी है? सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत और खुफिया एजेंसियों की आशंका के बावजूद राज्य सरकार ने कोई कड़े कदम क्यों नहीं उठाए? पंजाब पुलिस ने खुफिया सूचना को इतने हल्के में कैसे ले लिया? क्या पंजाब सरकार ने मान लिया था कि अब राज्य में आतंकी घटनाएं संभव नहीं हैं? क्या पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई, कश्मीर के आतंकी संगठन और खालिस्तानी आतंकवाद एकजुट होकर भारत में हिंसा फैलाने की साजिश रच रहे हैं? क्या आने वाले दिनों में ये आतंकवादी पंजाब में मुसीबत बनने वाले हैं?
पंजाब में हुए आतंकी हमले ने 40 साल पहले के जख्मों को कुरेद दिया है। 13 अप्रैल, 1978 को इसी तरह निरंकारी भवन पर हमला किया गया था। इसके बाद अकालियों और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 13 अकाली मारे गए थे। इस खूनी संघर्ष के विरोध में जब अकालियों ने प्रदर्शन किया था तो आतंकी जरनैल सिंह भिडंरावाला इसमें शामिल हुआ था। इसके बाद पंजाब में आतंकवाद ने पैर पसारने शुरू किए थे। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब से आतंकवाद और भिंडरावाला दोनों का खत्मा हो सका था। पिछले कई महीनों से पंजाब में चिंतित करने वाली घटनाएं हो रही हैं। 15 नवंबर को खुफिया एजेंसियों ने 7 आतंकियों के फोटो रिपोर्ट जारी कर हमले की आशंका जताई थी। बावजूद राज्य सरकार नहीं चेती। दरअसल, आईएसआई ने आतंकी हरमीत सिंह पीएचडी को पंजाब का माहौल खराब करने की जिम्मेदारी सौंपी है। इसके अलावा खालिस्तानी आतंकी वधावा सिंह बब्बर, परमजीत सिंह पंजवाड़, लखबीर सिंह रोडे आदि को पाकिस्तान में पनाह दी गई है। आईएसआई पंजाब में भी कश्मीर की तर्ज पर स्थानीय युवकों को बहलाकर आतंकवादी बनाने में जुटी है। वह सोशल मीडिया के जरिए इन्हें हैंड ग्रेनेड के इस्तेमाल की ट्रेनिंग दे रही है। आईएसआई, कश्मीर के आतंकी संगठन और पंजाब के खालिस्तानी आतंकियों ने मिलकर काम शुरू कर दिया है। यदि सरकार चाहती है कि पंजाब आतंक की आग में न जले तो उसे ठोस कदम उठाने पड़ेंगे वरना इतिहास फिर दोहराया जा सकता है।

नये दलों से निपटने की चुनौती

 अजय कुमार

उत्तर प्रदेश में आम चुनाव की आहट के बीच एक और नये दल ने ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी से बगावत करके अपना अलग दल बनाने वाले अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव हुंकार भर ही रहे थे, इस बीच निर्दलीय विधायक और बाहुबली नेता कुंवर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने भी अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा कर दी। शिवपाल और राजा भैया के मैदान मेे आने के बाद यूपी की सियासत में काफी खींचतान दिखने लगी है। शिवपाल और राजा भैया ने नया दल बनाकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेताओं की भी नींद हराम कर दी है। आंकलन इस बात का भी हो रहा है कि कौन किसको कितना नफा-नुकसान पहुंचायेगा।
सपा से बगावत करके अपना अलग दल बनाने वाले शिवपाल यादव मुस्लिम और यादव वोटरों के सहारे अपनी स्थिति मजबूत करने का सपना पाले हुए हैं तो राजा भैया की नजर अपर कास्ट वोटरों खासकर क्षत्रिय मतदाताओं पर है जिनकी यूपी में करीब 6-7 प्रतिशत तो पूर्वांचल में दस प्रतिशत के करीब है। राजा भैया की प्रतापगढ़ के आसपास के दो-तीन जिलों में अच्छी-खासी पैठ है। वह नौकरियों में आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट में पहले गिरफ्तारी फिर विवेचना के कानून को मुददा बनाकर अपर कास्ट वोटरों को लुभाना चाह रहे हैं। आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मोदी सरकार द्वारा पलटे जाने के बाद जिस तरह से सर्वण समाज नाराजगी जताते हुए सडक़ पर उतरा था,उसे राजा भैया अपने पक्ष में करने का सपना इसलिए पाले हुए हैं क्योंकि दलितों और पिछड़ों की नाराजगी से बचने के लिए किसी भी दल का नेता सवर्ण मतदाताओं का साथ नहीं दे रहा है।
शिवपाल यादव और राजा भइया की पार्टी किसको कितना नुकसान पहुंचायेंगी,यह तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन अपनी ताकत के बल पर यह दल वोट कटवा तो साबित हो ही सकते हैं। ऐसा हुआ तो कई लोकसभा सींटों पर इसका अच्छा-खासा असर पड़ेगा। हालांकि कुछ लोग शिवपाल के साथ-साथ राजा भैया के भी अलग दल बनाये जाने को भाजपा से जोडक़र देख रहे हैं। शिवपाल के बाद राजा भैया को भी बीजेपी की बी टीम बताया जा रहा है। मगर सच्चाई यह भी है कि हाल-फिलहाल मेें शिवपाल का बीजेपी के साथ जाना नामुनकिन है। जबकि राजा भैया जिधर अपना फायदा देखेंगे उधर का रूख कर सकते हैं, परंतु उन्होंने दलितों और पिछड़ों के खिलाफ जो राह पकड़ी है,उससे उनके लिए शायद ही कोई दल आसानी से रास्ता खोलेगा। बहरहाल, उत्तर प्रदेश की सियासत में दूर-दूर तक कोई ऐसा नेता नजर नहीं आता है जो करीब ढाई दशक से विधानसभा चुनाव जीत रहा हो,लेकिन किसी सियासी दल का सदस्य न हो, सिवाय कुण्डा जिला प्रतापगढ़ के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के। राजा भैया पहली बार 1993 में 12 वीं विधान सभा चुनाव में चुनाव जीत के आये थे,तब से लेकर 2017 तक उन्हें बिना अपना निर्वाचन क्षेत्र बदले किसी भी विधान सभा चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा। राजा भैया कहते भी थे कि राजा किसी के अधीन नहीं रह सकता है। वह चुनाव जरूर निर्दलीय लड़ते थे,लेकिन उनकी पकड़ कई विधान सभा सीटों तक थी। उनकी पहचान दबंग नेताओं में होती थी। अपने स्वभाव के कारण वह बसपा को छोडक़र अन्य तमाम दलों के प्यारे भी रहेे। सियासी सफर के दौरान कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव और अंत में अखिलेश यादव तक की सरकारों ने उन्हें मंत्री पद से नवाजा था। हां, राजा भैया के संबंध बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ अच्छे नहीं रहे। माया राज में राजा को जेल तक की हवा खानी पड़ी थी,लेकिन राजा की ताकत कभी कम नहीं हुई।
आम चुनाव में 25 वर्ष का सियासी सफर पूरा कर चुके रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को अपना अलग संगठन बनाने का निर्णय लेना पड़ा, जिसका नाम उन्होंने रखा जनसत्ता दल। हालांकि अभी चुनाव आयोग से उनके नाम को मंजूरी नहीं मिली है। लेकिन राजा भैया संगठन की ताकत बढ़ाने में जुट गये हैं। इसके लिए जनसत्ता दल की 30 नवंबर को लखनऊ में एक रैली बुलाई गई है। राजा भैया का कहना है कि एससी-एसटी एक्ट का विरोध करने के लिए उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई है। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रमोशन में भी आरक्षण प्रतिभाओं के साथ अन्याय है। अगर एक बार किसी को आरक्षण का लाभ मिला तो आगे उसको लाभ नही मिलना चाहिए। हमारी पार्टी इसके खिलाफ मोर्चा खोलेगी। उन्होंने कहा कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जिसपर सियासी पार्टियां सदन और बाहर कहीं भी नहीं बोलती हैं। इस तरह की राजनीति से जनता को निजात मिलनी ही चाहिए। फिलहाल तो उन्होंने लोकसभा चुनाव में किसी दल के साथ गठबंधन से इंकार किया है। राजा भैया लोकसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारने की बात भी कह रहे हैं। देखने वाली बात यह होगी कि वह किसका सिरदर्द बढ़ायेंगे।

हादसों और लापरवाही की खूनी सडक़ें

सडक़ पर दौड़ती गाड़ी मामूली गलती से भी न केवल दूसरों की जान ले सकती है, बल्कि खुद चालक और उसमें बैठे लोगों की जिंदगी भी खत्म हो सकती है। मुझे लगता है कि सडक़ों पर बेलगाम गाड़ी चलाना कुछ लोगों के लिए मौज-मस्ती एवं शौक का मामला होता है लेकिन यह कैसी मौज-मस्ती है जो कई जिन्दगियां तबाह कर देती है।

ललित गर्ग

‘दुर्घटना’ एक ऐसा शब्द है जिसे पढ़ते ही कुछ दृश्य आंखों के सामने आ जाते हैं, जो भयावह होते हैं, त्रासद होते हैं, डरावने होते हैं। किस तरह लापरवाही एवं महंगी गाडिय़ों को सडक़ों पर तेज रफ्तार में चलाना एक फैशन बनता जा रहा है, उसकी ताजी एवं भयावह निष्पत्ति की दुर्घटना दिल्ली के मीराबाग इलाके में बीते दिनों देखने को मिली, जब एक बेलगाम एसयूवी कार ने कई वाहनों को टक्कर मारी और नौ लोगों को कुचल दिया। इसमें एक लडक़ी की जान चली गई। यह घटना राजधानी में आए दिन होने वाले सडक़ हादसों की एक कड़ी भर है। सच यह है कि ऐसे बेलगाम वाहनों की वजह से सडक़ें अब पूरी तरह असुरक्षित हो चुकी हैं। सडक़ पर तेज गति से चलते वाहन एक तरह से हत्या के हथियार होते जा रहे हैं।
यह विडम्बनापूर्ण है कि हर रोज ऐसी दुर्घटनाओं और उनके भयावह नतीजों की खबरें आम होने के बावजूद बाकी वाहनों के मालिक या चालक कोई सबक नहीं लेते। सडक़ पर दौड़ती गाड़ी मामूली गलती से भी न केवल दूसरों की जान ले सकती है, बल्कि खुद चालक और उसमें बैठे लोगों की जिंदगी भी खत्म हो सकती है। मुझे लगता है कि सडक़ों पर बेलगाम गाड़ी चलाना कुछ लोगों के लिए मौज-मस्ती एवं शौक का मामला होता है लेकिन यह कैसी मौज-मस्ती है जो कई जिन्दगियां तबाह कर देती है। ऐसी दुर्घटनाओं को लेकर आम आदमी में संवेदनहीनता की काली छाया का पसरना त्रासद है और इससे भी बड़ी त्रासदी सरकार की आंखों पर काली पट्टी का बंधना है। हर स्थिति में मनुष्य जीवन ही दांव पर लग रहा है। इन बढ़ती दुर्घटनाओं की नृशंस चुनौतियों का क्या अंत है? बहुत कठिन है दुर्घटनाओं की उफनती नदी में जीवनरूपी नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना, यह चुनौती सरकार के सम्मुख तो है ही, आम जनता भी इससे बच नहीं सकती।
समृद्धि एवं सम्पन्नता ने लोगों के जीवन को एक मजाक बना दिया है, मगर ऐसा लगता है कि यातायात नियमों का पालन करना तथाकथित धनाढ्य लोगों के लिए दोयम दर्जे का काम हैं। इस मानसिकता वाले लोग दुर्घटनाएं करना अपनी शान समझते हैं। तभी सुप्रीम कोर्ट भी तल्ख टिप्पणी कर चुका है कि ड्राइविंग लाइसेंस किसी को मार डालने के लिए नहीं दिए जाते। सचाई यह भी हैं कि नियमों के उल्लंघन की एवज में पुलिस की पकड़ में आने वाले लोग बिना झिझक जुर्माना चुकाकर अपनी गलती के असर को खत्म हुआ मान लेते हैं। बेलगाम वाहन चलाने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि हादसों से संबंधित कानूनी प्रावधान अभी इस कदर कमजोर हैं कि किसी की लापरवाही की वजह से दो-चार या ज्यादा लोगों की जान चली जाती है और आरोपी को कई बार थाने से ही छोड़ दिया जाता है। जाहिर है, जब तक सडक़ पर वाहन चलाने को लेकर नियम-कायदों पर अमल के मामले में सख्त और असर डालने वाले कानूनी प्रावधान तय नहीं किए जायेंगे, तब तक सडक़ पर बेलगाम होकर गाड़ी चलाने वाले लोगों के भीतर जिम्मेदारी नहीं पैदा की जा सकेगी।
सडक़ दुर्घटनाओं ने कहर बरपा रखा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2009 में सडक़ सुरक्षा पर अपनी पहली वैश्विक स्थिति रिपोर्ट में सडक़ दुर्घटनाओं की दुनिया भर में ‘सबसे बड़े कातिल’ के रूप में पहचान की थी। भारत में होने वाली सडक़ दुर्घटनाओं में 78.7 प्रतिशत हादसे चालकों की लापरवाही के कारण होते हैं। एक प्रमुख वजह शराब व अन्य मादक पदार्थों का सेवन कर वाहन चलाना है। ‘कम्यूनिटी अगेन्स्ट ड्रंकन ड्राइव’ (कैड) द्वारा सितंबर से दिसंबर 2017 के बीच कराए गए ताजा सर्वे में यह बात सामने आई है कि दिल्ली-एनसीआर के लगभग 55.6 प्रतिशत ड्राइवर शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं। राजमार्गों को तेज रफ्तार वाले वाहनों के अनुकूल बनाने पर जितना जोर दिया जाता है उतना जोर फौरन आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध कराने पर दिया जाता तो स्थिति कुछ और होती।
एक आंकलन के मुताबिक आपराधिक घटनाओं की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों की मौत सडक़ हादसों में होती है। कहीं बदहाल सडक़ों के कारण तो कहीं अधिक सुविधापूर्ण अत्याधुनिक चिकनी सडक़ों पर तेज रफ्तार अनियंत्रित वाहनों के कारण ये हादसे होते हैं। दुनिया भर में सडक़ हादसों में बारह लाख लोगों की प्रतिवर्ष मौत हो जाती है। इन हादसों से करीब पांच करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। बात केवल राजमार्गों की ही नहीं है, गांवों, शहरों एवं महानगरों में सडक़ हादसों पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं। सरकार की नाकामी इसमें प्रमुख है।
हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देश भर में होने वाली सडक़ दुर्घटनाओं में रोजाना चार सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई। अत: यातायात-अनुशासन बहुत जरूरी है। अगर सरकार नए वाहनों को लाइसेंस देना बंद नहीं कर सकती तो कम से कम राजमार्गों पर हर चालीस-पचास किलोमीटर की दूरी पर एक ट्रॉमा सेंटर तो खोल ही सकती है ताकि इन हादसों के शिकार लोगों को समय पर प्राथमिक उपचार मिल सके। इतना ही नहीं हमें हादसों की स्थितियों पर नियंत्रण के ठोस उपाय करने ही होंगे।

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