ई-रिक्शा चालकों की मनमानी ने बिगाड़ी यातायात की चाल, पुलिस-प्रशासन नाकाम

  • जिम्मेदारों की लापरवाही से ठंडे बस्ते में गया रूट सर्वे
  • ई-रिक्शा के लिए निर्धारित किए गए थे 22 रूट
  • 30 फीट से अधिक चौड़ी सडक़ों पर ई-रिक्शा के संचालन पर पाबंदी लगाने की सिफारिश

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। लखनऊ की शायद ही कोई सडक़ हो जो ऑटो और बैटरी चालित ई-रिक्शा की मनमानी से अछूती हो। शहर के चौराहों और सडक़ों पर दिन-रात सार्वजनिक यातायात के इन साधनों की अराजकता जारी है। इनकी यह मनमानी लोगों को बेहाल कर रही है। राजधानी की सडक़ों पर फर्राटा भर रहे बैटरी चालित ई-रिक्शा संचालकों की यह मनमानी शासन-प्रशासन की नाकामी को बखूबी बयां कर रही है। आमजन का यह दर्द ऐसा है, जो डराता है इन साधनों में यात्रा करने वालों को। पर, विडंबना है कि सभी को इसकी जानकारी होने के बावजूद शहर का यह दर्द दूर नहीं हो पा रहा है।
ई-रिक्शा संचालक न नियम मानने को तैयार, न रूट की शर्त। कहीं चालक सीट संभाले बैठे नाबालिग, तो कहीं पालथी मार कर बैठे ई-रिक्शा चालक राजधानी की सडक़ों पर फर्राटा भरते दिख जायेंगे। नियमत: पांच सवारियों वाले इस रिक्शे में ये दस से ग्यारह लोगों को भी बैठाने में नहीं हिचकते। सवारियों की जान जोखिम में पड़े, तो पड़े। न इन्हें इससे मतलब है और न शासन-प्रशासन को। जानकारों की मानें तो बीते फरवरी माह में राज्य सरकार द्वारा आयोजित किये गये निवेशकों के मेगा-शो इंवेस्टर्स समिट से पूर्व ई-रिक्शा संचालन से अव्यवस्थित हो चुकी शहर की सडक़ों पर इनकी संख्या और रूट सीमित करने की कोशिश शुरू की थी। इनके लिए रूट का सर्वे भी हुआ था। मनमाना संचालन रोकने के लिये 31 मार्ग चिन्हित भी हुये लेकिन इसके बाद न प्रशासन का ध्यान इस ओर गया और न यातायात पुलिस का। हालात यह हैं कि शहर के हर चौराहे पर चालक सवारी लेने की होड़ में मनमानी करते हैं। कोई दायें से झपटता है तो कोई बायें से। इस दौरान कोई चोटिल होता है, तो हो। प्रशासन द्वारा पूर्व में की गई इस कसरत में राजधानी के लगभग 157 से अधिक रूट पर ई- रिक्शा का संचालन मिला था, जबकि 22 रूट पर ही चलने की इन्हें अनुमति है। इस सर्वे में 30 फीट से अधिक चौड़ी सडक़ों पर ई-रिक्शा के संचालन पर रोक लगाने की बात भी कही गई थी। पर, अधिकारी सर्वे करके भूल गये और यह कार्रवाई भी ठंडे बस्ते में चली गई। अराजकता की शिकार राजधानी की यातायात से आमजन परेशान हैं। ऐसा नहीं है कि राजधानी पुलिस के कैमरों में यह मनमानी कैद नहीं होती होगी। बावजूद इसके शहर में इन अव्यवस्थित सार्वजनिक यातायात के संचालकों की मनमानी जारी है। यह मनमानी किसकी शह पर चल रही है? यह सवाल गंभीर है।

शहरवासियों को गृहकर निर्धारण और जलकर नामांतरण की ऑनलाइन सुविधा देने में नगर निगम फिसड्डी

  • सीवर व पेयजल कनेक्शन की ऑनलाइन सेवा भी नहीं शुरू कर रहा है नगर निगम प्रशासन
  • अभियंताओं और बाबुओं के चक्कर काटने को मजबूर हैं लोग

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। शहरवासियों को हाउस टैक्स संबंधी कार्यों के लिए दी जाने वाली ऑनलाइन सुविधाओं में नगर निगम फिसड्डी साबित हो रहा है। सरकार की मंशा है कि शहरवासियों को गृहकर और जलकर नामांतरण के लिए नगर निगम के चक्कर न काटने पड़े। इसके लिए कई बार शासन द्वारा निर्देश भी जारी किए जा चुके है कि गृहकर निर्धारण और जलकर नामांतरण के लिए ऑनलाइन सुविधा दी जाए लेकिन विभाग इसको शुरू नहीं कर रहा है। इससे लापरवाह कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है। इसी तरह कर निर्धारण, ऑनलाइन सीवर व पेयजल कनेक्शन के लिए आवेदन करने की सुविधा भी अभी तक शुरू नहीं की जा रही है। आलम यह है कि पानी कनेक्शन के लिए भी जलकल अभियंता और बाबुओं की परिक्रमा करनी पड़ती है और यही हाल नामांतरण का है।
नगर निगम द्वारा प्रत्येक सप्ताह आयोजित लोक मंगल दिवस में ऐसे तमाम मामले प्रकाश में आ चुके हैं। नगर निगम के गृहकर निर्धारण के मामलों की बात करें तो सैकड़ों मामले अभी भी लम्बित हैं। ऐसी तमाम सुविधाएं जनता को नहीं मिल रही हैं। इसके चलते लोगों को विभाग के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कर निर्धारण व नामांतरण की ऑनलाइन सुविधा नगर निगम नहीं दे पाया है जबकि विभाग वेतन पेंशन संकट से निपटने के लिए हाउस टैक्स पर ही निर्भर है। वित्तीय स्थिति सुधारने को लेकर इस निगम प्रशासन का सारा जोर टैक्स वसूली पर है। सुविधाओं को दरकिनार कर शहर भर में टैक्स न देने वालों की कुर्की और सीलिंग की जा रही है। हालांकि नियमानुसार नगर निगम की कार्रवाई सही है, लेकिन जनता टैक्स के बदले सुविधाओं की मांग करती है। निगम की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कर निरीक्षकों से लेकर जोनल अधिकारियों तक भी हर दिन वसूली बढ़ाने का दबाव है। संयुक्ता भाटिया कई बार गृहकर निर्धारण और नामांतरण की प्रक्रिया आसान करने के निर्देश दे चुकी है लेकिन अब तक इस पर अमल नहीं हो पाया है। यह तब है जब गृहकर निर्धारण प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए ही 2002 में स्वकर निर्धारण प्रक्रिया शुरू की गई थी जिसमें व्यवस्था है कि भवन स्वामी को किसी बाबू और कर निरीक्षक के पास न जाना पड़े और वह घर बैठे ही अपना टैक्स निर्धारण कर ले लेकिन इसे लागू कराने में निगम प्रशासन फेल है।

 

Pin It