दोस्त का मामला है जी

राजधानी की सुरक्षा की कमान संभाल रहे साहब कमाल की कला दिखाते हैं। वे मातहतों को भी इस कलाबाजी में निपुण करने में जुटे हैं। अपनों के लिए बड़े उदार हैं। अगर किसी ने उनके अपनों को परेशान किया तो उसकी खैर नहीं। भले ही वह उनका मातहत ही क्यों न हो। अपने एक साथी की शिकायत पर साहब आगबबूला हो गए। दनदनाते मौके पर पहुंचे और लगे खरी-खोटी सुनाने। मातहत ने साहब की कला देख आंखें नीची रखने में ही भलाई समझी लेकिन साहब का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था। हिम्मत कैसे पड़ी मेरे दोस्त को परेशान करने की। अब यहां से पतली गली पकड़ो। बिना गाड़ी पैदल जाओ तब समझ आएगा मातहती किसे कहते हैं। अरे भाई दोस्त का मामला था वरना तमाम शिकायतों को साहब नजरअंदाज कर देते हैं।

 

Pin It