प्रतिभाओं के देश भारत में हो रहा है प्रतिमाओं का बोलबाला

 संतोष उत्सुक

हमारा देश प्रतिमाओं के दीवानों की धरती है। हाल ही में देश की एकता को पुन: समाहित करने के लिए लगभग तेईस सौ करोड़ रुपए खर्च कर विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया गया। एक और विशाल प्रतिमा मुंबई के समंदर में निकट भविष्य में प्रस्तुत होने वाली है। प्रतिमा, प्रतिमान शब्द का ही एक रूप है। प्रतिमान का अर्थ परछाई, प्रतिमा, प्रतिमूर्ति, चित्र भी है। वह वस्तु या रचना जिसे आदर्श या मानक मानकर उसके अनुरूप और वस्तुएं बनाई जाएं। हमारा देश व समाज प्रतिमा पूजक भी है और व्यक्ति पूजक भी। प्रतिमा का मुकाबला आदमी नहीं कर सकता। हां वह नए मानक गढ़ सकता है। हमारे यहां वह प्रतिमा से बढ़ाए महत्वपूर्ण, महान, महंगा नहीं हो सकता।
प्रतिमाओं को बनाने में तकनीक का बारीकी से ध्यान रखा जाता है। वह तेज चलने वाली हवाएं झेल सकती है, भूकंप का सामना कर सकती है, बाढ़ में खड़ी रह सकती है। इनके सामने आम आदमी की क्या औकात। उसे तो स्वतन्त्रता के सात दशक बाद भी जीवन की आधारभूत सुविधाएं जुटाने के लिए जूझना पड़ता है। खैर यहां बात इन्सानों की नहीं हो रही।
हमारे यहां ज्यादातर प्रतिमाएं राजनीतिक व धार्मिक आधार पर लगाई जाती हैं। यह दिलचस्प है कि दुनिया में सबसे अधिक मूर्तियां महात्मा बुद्ध और बाबा अंबेडकर की हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमाएं दुनिया के 71 से अधिक देशों में हैं। राजनीतिक दलों द्वारा अपनी अवसरवादी व स्वार्थी सोच के आधार पर पार्क बनाने और उसमें मूर्तियां स्थापित करने का अपना इतिहास है। इनमें देश के पैसे का खूब सदुपयोग होता है। मूर्तियां तोडऩे व कालिख पोतने के कितने ही किस्से हैं जिनमें नए किस्से जुड़ते जाते हैं। यह किस्से न्यायालयों के आंगन में बरसों पड़े जाते हैं। वैसे देखने में आया है कि आम तौर पर प्रतिमाएं श्रद्धा, भक्ति, ईमानदारी के साथ-साथ उत्कृष्ट सामग्री से बनाई जाती हैं और बनते-बनते ढह जाने वाले पुलों जैसी नहीं होतीं। यह भी सत्य है कि लगभग सभी प्रतिमाओं की देख-रेख का अच्छा रिकार्ड नहीं है। गांधीजी की मूर्ति लगभग साल भर पूरी तरह से उपेक्षित रहती है। उनका जन्मदिन आने से पहले ही प्रशासन या गांधी प्रेमियों में उनके बुत को साफ कर रंग रोगन करने या उनका चश्मा ठीक करवाने का विचार जन्म लेता है। कितनी ही प्रतिमाएं तो स्थापित होने के बाद वस्तुत: विस्थापित कर दी जाती हैं। देश के कोने-कोने में नई प्रतिमाएं स्थापित होती रहती हैं। इस बहाने रोजगार जरूर मिलता रहता है। बीबीसी ने लिखा है कि इतनी बड़ी प्रतिमा पर धन खर्च करने की बजाय सरकार को यह पैसा राज्य के किसानों के कल्याण के लिए लगाना चाहिए था। गरीब परिवार यहां भूखे पेट जिंदगी गुजार रहे हैं। बीबीसी इस बात को नहीं समझती कि हमारे यहां महापुरुषों को याद करना, उनकी विश्व स्तरीय प्रतिमाएं बनाना, उनकी याद में खर्चीले आयोजन करना राष्ट्रभक्ति का एक अहम हिस्सा है। क्या राष्ट्रभक्ति और राजनीति एक ही वस्तु होती है। किसी भी देश में अपनी मातृभूमि के लिए अथक काम करने वालों की कमी नहीं होती, सैंकड़ों लोग राष्ट्र व समाज के लिए निस्वार्थ बिना किसी लालच, द्वेष या मान्यता के निरंतर जुटे रहते हैं। क्या प्रतिमा स्थापित होने से ही देश के स्वाभिमान व गौरव के बारे में दुनिया को पता चलता है। क्या सभी की वस्तुस्थिति से दूसरे सब परिचित नहीं है। कोई देश अपनी लाख शेखी बखार ले दूसरे देश भी तो समझने की बुद्धि रखते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मूर्तियों नहीं, भारत में प्रदूषण से मरने वाले बच्चों की मौत के जो आंकड़े दिए हैं उनको जानकार हमारे स्वर्गवासी राष्ट्रनायकों की आत्मा खुश तो नहीं होगी। इन आंकड़ों की वजह से प्रतिमाओं पर करोड़ों खर्च करने वाला यह देश नाइजीरिया, पाकिस्तान और कांगो जैसे गंभीर समस्याओं से ग्रस्त देशों की श्रेणी में नायक है। डब्ल्यूएचओ का सर्वेक्षण कहता है कि 2016 में भारत में जहरीली हवा के कारण एक लाख दस हजार बच्चे असमय मृत्यु का ग्रास बने हैं।
क्या कोई भी राजनीतिक दल इस बात को मुद्दा मानता है। क्या भविष्य में चुनाव जीतने वाले दल अपने नेताओं की प्रतिमाएं निर्मित करने का ख्वाब नहीं देख रहे होंगे। संसार की सबसे ऊंची प्रतिमा उनके अपने देश में है, उनके लिए जबर्दस्त प्रेरणा साबित होगी। क्या प्रतिमाएं ही राजनीतिक विकास का नया प्रतिमान बनी रहेंगी।

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