दीपों का पर्व है दीपावली

दीपावली यानी दीपों का पर्व। बगैर दीप के इस पर्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पहले था भी ऐसा ही। हर घर में दीये जलते थे। किसी के यहां पांच सौ, तो किसी के यहां हजार। इसका सामाजिक, आर्थिक फायदा तो था ही, दीये बनाने वाला कुम्हार समाज भी खुश रहता था। लेकिन, यह परंपरा धीरे-धीरे औपचारिकता के दायरे में सिमटती जा रही है। वजह है चाइनीज लाइट। चाइनीज लाइट ने दीये की अस्मिता को खतरे में डाल दिया है। बावजूद इसके चाइनीज लाइट अपनी जगह है और मिट्टी के दीये अपनी जगह। तो, आइए इस दिवाली मिट्टी के दीये जलाएं। भारतीय संस्कृति को मजबूत बनाएं। दीये जलाने से कुम्हारों के घर भी दिवाली मनेगी। दीप जलेंगे और उनके घर भी खुशहाली आएगी। हमारी आंखें भी सुरक्षित रहेंगी…

 

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