शहरों में बढ़ता शोर खतरे की घंटी

सवाल यह है कि शहरों में इतना शोर क्यों हो रहा है? क्या शहरों का अनियोजित विकास इसकी सबसे बड़ी जड़ है? क्या ध्वनि प्रदूषण के लिए सडक़ों पर दौड़ रहे वाहन जिम्मेदार हैं? क्या लचर यातायात व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या लोगों की सेहत की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं बनती है? क्या इस प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार ने कोई कार्य योजना तैयार की है या वह स्थितियों के विस्फोटक होने का इंतजार कर रही है?

Sanjay Sharma

वायु प्रदूषण ही नहीं बल्कि शहरों में बढ़ता शोर भी अब असहनीय होता जा रहा है। तेजी से बढ़ रहा ध्वनि प्रदूषण लोगों की सेहत के लिए बेहद घातक है। बावजूद इसके समाज में कोई जागरूकता दिखाई नहीं पड़ रही है। वहीं सरकारी तंत्र भी इस पर नियंत्रण लगाने की कोशिश करता नहीं नजर आ रहा है। यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में लोगों को खतरनाक प्रदूषण का सामना करना पड़ेगा। अहम सवाल यह है कि शहरों में इतना शोर क्यों हो रहा है? क्या शहरों का अनियोजित विकास इसकी सबसे बड़ी जड़ है? क्या ध्वनि प्रदूषण के लिए सडक़ों पर दौड़ रहे वाहन जिम्मेदार हैं? क्या लचर यातायात व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या लोगों की सेहत की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं बनती है? क्या इस प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार ने कोई कार्य योजना तैयार की है या वह स्थितियों के विस्फोटक होने का इंतजार कर रही है?
त्यौहारी सीजन शुरू हो चुका है। दो दिन बाद दीपावली है। पटाखों का शोर सुनाई देने लगा है। ये पटाखे न केवल वायु बल्कि ध्वनि प्रदूषण भी फैला रहे हैं। ऐसे में ध्वनि प्रदूषण पर चर्चा लाजिमी है। देश की राजधानी दिल्ली समेत तमाम शहर ध्वनि प्रदूषण से जूझ रहे हैं और इसमें इजाफा हो रहा है। यूपी की राजधानी लखनऊ भी इससे अछूती नहीं है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकॉलजी रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर-अक्टूबर में अलीगंज शहर का सबसे शोरगुल वाला इलाका रहा। यहां 79.9 डेसिबल और अमीनाबाद में 79.3 डेसिबल तक शोर रिकॉर्ड किया गया हैं। यही हाल अन्य शहरों का भी है। बढ़ते ध्वनि प्रदूषण के लिए शहरों का अनियोजित विकास और लचर यातायात व्यवस्था जिम्मेदार है। अनियोजित विकास के कारण व्यावसायिक व रिहायशी इलाके एक-दूसरे से जुड़ गए। लिहाजा यहां शोर बढ़ गया। सडक़ों पर बढ़ते अतिक्रमण से जाम की स्थिति पैदा हुई। इसके कारण सडक़ों पर वाहन रेंगते हैं और वाहन चालक हार्न का प्रयोग करते हैं। लखनऊ की यातायात व्यवस्था ठीक नहीं हो सकी है। कई स्थानों पर सिग्नल काम नहीं कर रहा है तो चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस के सिपाही नदारद रहते हैं। इसके चलते यातायात अनियंत्रित हो जाता है। मानकों के मुताबिक व्यक्ति के लिए 50 डेसीबल तक का शोर बर्दाश्त के काबिल है। इसके ऊपर का शोर सेहत के लिए नुकसानदायक है। इसके कारण व्यक्ति की सुनने की शक्ति बाधित हो सकती है। व्यक्ति दिल, सिरदर्द और चिड़चिड़ेपन जैसी बीमारियों की चपेट में आ सकता है। जाहिर है सरकार को ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जल्द ही कोई उपाय करना होगा अन्यथा स्थितियां खतरे के निशान को पार कर जाएंगी।

 

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