वन्यजीवों से बढ़ते टकराव का दोषी मनुष्य खुद

हर साल धरती से एक प्रतिशत जंगल का सफाया किया जा रहा है जो पिछले दशक से पचास प्रतिशत ज्यादा है। शहरीकरण के बढ़ते दबाव, विकसित होने की लालसा में अंधाधुंध होते विकास ने हमें हरियाली से भी लगभग वंचित कर दिया है, घर के एक हिस्से में आम-नीम के पेड़ लगे होना अब गुजरे वक्त की बात हो चुकी है, छोटे-छोटे फ्लैट में बोनसाई का एक छोटा सा पौधा लगाकर हम हरियाली को महसूस करने का एक भ्रम पाल रहे हैं।

अपूर्व बाजपेयी

पिछले दो सालो में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र पीलीभीत, मैलानी जिलों में करीब दो दर्जन से ज्यादा लोग बाघ का शिकार हो चुके हैं, इन सभी घटनाओं में अधिकतर घटनाओं में वही व्यक्ति बाघ या जंगली जानवर का शिकार हुआ जो बाघ अभयारण्य, टाइगर रिजर्व में प्रतिबंध होने के बाबजूद अंदर गया। यहां 22 से अधिक मौतें, वो भी एक के बाद एक, इन सभी घटनाओं के बाद गांववालों का पुलिस प्रशासन पर गुस्सा करना, तोडफ़ोड़ करना लाजिमी है। स्थानीय नेताओं ने भी ऐसे वक्त में अपनी राजनीती चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन किसी ने भी सरकार का ध्यान इस ओर दिलाने के बारे में नहीं सोचा कि बाघों या अन्य जंगली जानवरों द्वारा आबादी के पास या अंदर आकर व्यक्तियों का शिकार करने का प्रमुख कारण क्या है?
दरअसल पशुओं से हमारे रिश्ते एक जैसे कभी नहीं रहे, एक प्रजाति के तौर पर हमने अपने लालच को सामने रखकर तय कर लिया कि किसे घर में रखना है और किसका संहार करना है। मतलब जिस जानवर से कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं हुआ उसे ‘खत्म’ करने की नीति बनी और जो लाभकारी साबित हुआ उसे पवित्र और धार्मिक घोषित कर दिया गया। वर्तमान में मांसाहारी पशु तो बहुत बुरी हालत में हैं। वनों में वन्य प्राणियों की कमी के कारण मांसाहारी पशु अब गांवों में आबादी के बीच जाकर मवेशियों या कभी कभी मनुष्यों को ही अपना शिकार बना रहे हैं। वन विशेषज्ञों के अनुसार मानवजनित या प्राकृतिक परिस्थितियां ही मानव पर हमला करने को विवश करती हैं। पिछले करीब पांच दशकों पहले तक जब बाहुल्य क्षेत्रफल में जंगल थे तब मनुष्य और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओ में सुरक्षित रहे लेकिन बदलते दौर में विकासशील भारत में जब आबादी बढ़ी तो वनों का अंधाधुंध विनाश किया जाने लगा, जिसके परिणामस्वरूप जंगलों का दायरा सिमटकर एक निश्चित क्षेत्र तक ही सीमित रह गया। वन्यजीव बाहर निकलकर भागे और उसके बाद शुरू हुआ न खत्म होने वाला मनुष्य और वन्यजीवों के संघर्ष का वो दौर जो अभी भी बदस्तूर जारी है।
उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में कुछ साल पहले जब बाघों का कुनबा बढ़ा तो प्रदेश सरकार ने उस क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया, चूंकि टाइगर रिजर्व होने के बाद भी प्रशासन एवं वन्यकर्मियों की मिलीभगत से इन जंगलों के अंदर अनधिकृत रूप से शिकारियों का जाना जारी रहा, जिन्होंने बड़े पैमाने पर चीतल, हिरन, बारहसिंघा का शिकार किया, जो कि बाघों के प्रमुख भोजन हैं, यह भी एक कारण है, जो बाघ अपनी भूख मिटाने बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। जबकि समस्या का स्थायी हल केवल और केवल पर्यावरण एवं वन संरक्षण के जरिये ही संभव है।
पर्यावरण असंतुलन को बढ़ावा देने में कई तरह के कारक शामिल हैं। इसका एहसास भी हो रहा है, बावजूद इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, जिससे सरकारी या गैर सरकारी सभी योजनाएं/अभियान सिर्फ फाइलों तक सिमटकर रह जाते हैं। रातों रात अमीर बनने की चाहत और सुविधा का उपभोग करने की ललक में न केवल पेड़ों की कटाई हो रही है, बल्कि काटे गये पेड़ की जगह दूसरा पौधा लगाने की फिक्र भी नही है। सरकारी स्तर पर होने वाले वृक्षारोपण कार्यक्रम में स्थानीय लोगों का जुड़ाव नहीं हो पाता, संस्थायें पेड़ पौधे लगाकर चली जाती हैं और बाद में उन पौधों में कोई पानी देने वाला भी नहीं होता है।
जंगल के नियमों के मुताबिक बाघों का जंगल के अंदर कई किलोमीटर तक का खुद का एक निर्धारित क्षेत्र होता है, उस क्षेत्र में दूसरा बाघ नहीं रहता, यही कारण है कि जंगलों की कमी के कारण बाघ बस्ती अथवा खेतों की ओर जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक हर साल धरती से एक प्रतिशत जंगल का सफाया किया जा रहा है जो पिछले दशक से पचास प्रतिशत ज्यादा है। शहरीकरण के बढ़ते दबाव, विकसित होने की लालसा में अंधाधुंध होते विकास ने हमें हरियाली से भी लगभग वंचित कर दिया है, घर के एक हिस्से में आम-नीम के पेड़ लगे होना अब गुजरे वक्त की बात हो चुकी है, छोटे-छोटे फ्लैट में बोनसाई का एक छोटा सा पौधा लगाकर हम हरियाली को महसूस करने का एक भ्रम पाल रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर, मैलानी के जंगलों के बीच हाइवे निकालने का मामला प्रकाश में आया है, जिसके अंतर्गत लगभग 55000 पेड़ों की बलि देनी होगी, इसमें से कई पेड़ तकरीबन 250 साल पुराने हैं। योजना से जुड़े अधिकारियों को सोचना होगा कि हाइवे निकलने से वन्यजीवों का निवास स्थान दो भागों में बंट जायेगा तथा हाइवे क्रास करने की आपाधापी में वन्यजीव दुर्घटना का शिकार भी होंगे। हमें समझना होगा कि दुनिया की बेहतरी के लिए मनुष्य का होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी वन्यजीवों का होना भी है।

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