दीयों से दूसरों के घरों को रौशन करने वाले कुम्हारों के घर अंधेरा

  • झालरों और प्लास्टिक के बर्तनों के कारण खतरे में मिट्टी कला
  • लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा बनाने वालों के सामने जीविका का संकट

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

Potters busy to make diyas(earthen lamps) ahead of Deepawali festival at a workshop in Lucknow.Express photo by Vishal Srivastav 25.10.2018

लखनऊ। दीपावली पर दूसरों के घरों को रौशन करने के लिए दीपक और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां बनाने वाले कुम्हारों के घरों में आज भी अंधेरा है और लक्ष्मी उनसे रूठी हैं। बाजारवाद और जगमगाती झालरों ने इसके सामने दो-जून की रोटी की समस्या उत्पन्न कर दी है। बावजूद इसके वे इस बार भी दीपावली पर पूरे परिवार के साथ दीपकों और मिट्टी के तमाम मूर्तियों को बनाने में जुटे हैं।
कुम्हारों के लिए दीपावली केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि जीवनयापन का बड़ा जरिया भी है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि दीपावली के दिन लोग घरों में जिस लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते है, उनकी मूर्तियां गढऩे वाले कुम्हारों की आर्थिक हालत बेहद खराब है। दीपक और कुलिया बनाने वाले कुंभकारों के घर पर आज भी अंधेरा है। पूजा आदि के आयोजनों पर प्रसाद वितरण के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी की प्याली, कुल्हड़ एवं भोज में पानी के लिए मिट्टी के ग्लास आदि भी अब प्रचलन में नहीं रह गए है। इसकी जगह कागज और प्लास्टिक की वस्तुओं ने ले ली है। इसके कारण उनकी जीविका पर संकट गहरा गया है। पारम्परिक दीपकों की जगह मोमबत्ती एवं बिजली की झालरों ने ले ली है। इस कारण भी कुम्भकारों की जिन्दगी में दिन प्रतिदिन अंधेरा फैलता जा रहा है और वे अपनी पुस्तैनी कला एवं व्यवसाय से विमुख हो रहे हैं। रामसेवक का कहना है कि दीपावली पर दीयों की मांग लगातार कम होती जा रही है। मिट्टी की मूर्तियों और खिलौने भी अब कम ही बिकते हैं। लिहाजा कुंभकारी कला खतरे में पड़ गई है। इससे जीविका चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। नई पीढ़ी इस कला को धीरे-धीरे छोडऩे लगी है। मिट्टी के दीयों एवं कुलियों पर भी आधुनिकता का प्रभाव पड़ा है। अब मिट्टी के कुलियों का व्यवसाय लगभग ठप पड़ गया है। शहर में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियों की मांग काफी बढ़ गयी है। इसकी एक वजह इसके कम कीमत और बेहतर लुक को माना जाता है। गौरतलब है कि मिट्टी की यह कला न सिर्फ प्राचीन धरोहर है बल्कि इससे कुम्हारों की आजीविका भी चलती है, लेकिन अब उनके सामने जीविका का संकट खड़ा हो गया है।

माटी कला बोर्ड का गठन

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में माटी कला एवं माटी शिल्प कला से संबंधित उद्योगों के विकास के लिए माटी कला बोर्ड का गठन किया है। इसके जरिये प्लास्टिक कप के स्थान पर मिट्टी के कुल्हड़ों को प्रोत्साहित किया जाएगा। माटी कला बोर्ड के संचालक मंडल भी तय कर दिए गए हैं।प्रदेश में मिट्टी का कार्य करने वाले कारीगरों एवं शिल्पियों के व्यवसाय में वृद्धि करने, कलाकारों की परम्परागत कला को संरक्षित एवं संवर्धित करना इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य है। इसके साथ ही इन कारीगरों एवं शिल्पियों की सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सुदृढ़ता एवं तकनीकी विकास को बढ़ावा देने, विपणन आदि की सुविधा उपलब्ध कराने तथा परम्परागत उद्योगों को नवाचार के माध्यम से अधिकाधिक लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे।

मिट्टी मिलना हो गया मुश्किल
कुम्हारों को मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के लिए कच्चा माल अर्थात मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया है। शहर में घटती तालाबों की संख्या के कारण स्थितियां बिगड़ चुकी हैं।

लागत बढ़ी, खपत घटी
कुम्हारों को मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए मिलने वाला ईंधन काफी महंगा होता जा रहा है। आलम यह है कि 100 से 200 रुपया सैकड़ें गोबर के उपले मिलते हैं। यही नहीं 5 रुपये किलो भूसी मिल रही है। कुम्हार एक दिन में 600 से 800 दिए तैयार करता है। इसे पकाने में 60 से 70 रुपये खर्च होता है और ये 40 से 60 रुपये सैकड़े के भाव बिकते हैं। ऐसे में आमदनी ना के बराबर होती है।

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