जिद… सच की- आखिर इस दर्द की दवा क्या है?

सवाल यह है कि किसकी अनुमति से रेलवे ट्रैक के इतने करीब रावण दहन का आयोजन किया गया? क्या राज्य प्रशासन ने रेलवे को इसकी सूचना दी थी? स्थानीय प्रशासन ने लोगों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए? क्या भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस पूरी तरह नाकाम है?

SAnjay Sharma

अमृतसर में रेलवे टै्रक के पास रावण दहन के दौरान दो विपरीत दिशाओं से आ रही ट्रेनों की चपेट में आकर 61 लोगों की मौत हो गई जबकि 72 घायल हो गए। घटना की जांच के आदेश दिए गए हैं। केंद्र और राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों और घायलों को आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है। इन सबके बीच कई सवाल अभी अनुत्तरित हैं। अहम सवाल यह है कि किसकी अनुमति से रेलवे ट्रैक के इतने करीब रावण दहन का आयोजन किया गया? क्या राज्य प्रशासन ने रेलवे को इसकी सूचना दी थी? स्थानीय प्रशासन ने लोगों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए? क्या भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस पूरी तरह नाकाम है? इतनी अधिक भीड़ होने के बावजूद ट्रेन के ड्राइवर ने सतर्कता क्यों नहीं बरती? क्या मुआवजा देने भर से लोगों के दुख को कम किया जा सकता है? क्या सरकार इस हादसे से सबक लेगी?
देश में होने वाले बड़े आयोजन अक्सर हादसों का शिकार हो रहे हैं। कुछ वर्ष पहले बिहार में सहरसा-समस्तीपुर रेलखंड के बीच धमारा घाट स्टेशन पर अमृतसर जैसी घटना हुई थी। यहां राज्यरानी सुपरफास्ट ट्रेन की चपेट में आकर 37 यात्रियों की मौत हो गई थी जबकि सौ से अधिक घायल हो गए थे। कांवडिय़ों द्वारा रेल पटरी को पार करते समय यह हादसा हुआ था। अमृतसर हादसे ने एक बार फिर रेलवे और स्थानीय प्रशासन की लापरवाही उजागर कर दी है। टे्रन के टै्रक के इतने करीब रावण दहन के कार्यक्रम को पंजाब के स्थानीय प्रशासन ने स्वीकृति दी थी। साथ ही सुरक्षा के बंदोबस्त का आश्वासन भी दिया था। बावजूद सुरक्षा में घोर लापरवाही बरती गई। यहां तैनात कुछ पुलिसकर्मियों ने ट्रैक पर खड़े लोगों को हटाने की कोशिश तक नहीं की। रावण दहन के वक्त यहां पांच हजार से अधिक लोग एकत्र हो गए थे। यही नहीं स्थानीय प्रशासन ने रेलवे को इसकी सूचना देने तक की जहमत नहीं उठाई। रेलवे घटना की जिम्मेदारी नहीं ले रही है। सवाल यह है कि ड्राइवर ने इतनी बड़ी संख्या में ट्रैक पर खड़े लोगों को देखने के बाद भी इमरजेंसी ब्रेक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? ट्रेन की स्पीड कम करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या इस लापरवाही से रेल विभाग अपने को मुक्त कर सकता है? रेल विभाग यह कह कर अपना दामन नहीं बचा सकता कि पटाखों के धुएं के कारण ड्राइवर को कुछ नहीं दिखा। तमाम हादसों के बावजूद पुलिस भीड़ को नियंत्रित करने में नाकाम होती रही है। वहीं रेलवे अपने सिस्टम में सुधार को लेकर गंभीर नहीं है। सरकारें मुआवजा और जांच के नाम पर हादसों को भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो गई हैं। सरकार को इन खामियों को दूर करना होगा वरना निर्दोष अपनी जान गंवाते रहेंगे।

 

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