मिले भूख से आजादी

मनींद्र नाथ ठाकुर

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) ने विश्व का भूख सूचकांक प्रकाशित किया है। इस सूचकांक के अनुसार 119 देशों की लिस्ट में भारत 103 नंबर पर है और दक्षिणी कोरिया एवं बांग्लादेश से भी पीछे है। भारत की ऐसी बदहाली क्यों है? इससे बाहर निकलने का क्या उपाय हो सकता है? क्या इसके लिए समाज को भी जागरूक करना जरूरी नहीं है ?
भुखमरी को चार तरह के सूचक में बांटकर समझा जा सकता है। पहला अपर्याप्त कैलोरी के कारण होनेवाले कुपोषण, दूसरा पांच साल तक की उम्र के ऐसे बच्चों की संख्या जिनका कुपोषण के कारण उनकी ऊंचाई के अनुसार वजन कम है, तीसरा उन बच्चों की संख्या जिनकी कुपोषण के कारण ऊंचाई उम्र के हिसाब से कम है और बच्चों की मृत्यु दर। इसलिए इस सूचकांक में नीचे होने का मतलब स्थिति गंभीर होना है।
हम समझते हैं कि हमारे देश के बच्चों की संख्या आनेवाले समय में दूसरे देशों से आर्थिक रूप से सक्रिय जनसंख्या में हमें आगे ले जायेगी और यह हमारी बड़ी ताकत होगी। लेकिन यदि यह जनसंख्या बीमार और लाचार लोगों की हो जाये, तो यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी हो जायेगी। इस सूचकांक के आने से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि विकास के जो दावे हम बढ़-चढक़र कर रहे हैं, उसमें सच्चाई केवल आंशिक है। इतने वर्षों तक जिस जीडीपी और प्रतिव्यक्ति आय को हम विकास का मानक मानते रहे हैं, उससे हमारे समाज के बारे में शायद ही कुछ पता चलता है। अंतरराष्ट्रीय शक्ति बन पाने का हमारा सपना केवल सपना रह जायेगा, यदि हम इस समस्या का सही निदान नहीं निकाल सके। अच्छा तो यह हो कि राज्य सरकारें भी इस तरह का कोई सूचकांक बनायें, ताकि भारत के अंदर की विषमताओं को ठीक से समझा जा सके। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्थिति पहले से भी बदतर हो गयी है। हम कुछ और सीढ़ी लुढक़ गये हैं। आनेवाले समय में यदि कुछ नहीं किया गया, तो स्थिति और भी बदतर हो सकती है। क्या इसका यह अर्थ भी निकाला जाना चाहिए कि हमारा विकास समावेशी नहीं है? इस विकास का फल केवल ऊपर के हिस्सों में ही बंट जा रहा है? क्या यह नहीं समझना चाहिए कि विकास का मॉडल जो नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने हमें दिया है, यह उसका ही दुष्परिणाम है? विकास के इस मॉडल में एक तरफ संपत्ति और दूसरी तरफ गरीबी जमा हो रही है। नव उदारवादी आर्थिक चिंतन में विकास का मापदंड कुछ ऐसा बना है कि समावेशी विकास को उसमें कोई महत्व नहीं मिल पाता है।
नव उदारवादी नीतियों ने भारतीय राज्य के लोक कल्याणकारी स्वरूप को जो झटका दिया है, यह उसी का परिणाम है। यह बात सरकारों को समझ लेना होगा कि राष्ट्र का हित संविधान के उन नीति-निर्धारक नीतियों का पालन करने में ही है, जिसने भारतीय समाज को वर्षों तक पूंजीवादी वर्चस्व से बचाये रखा। सच तो यह है कि अब नीति-निर्धारक नीतियों को प्रमुखता देने का समय आ गया है। भारत को इस समस्या से निजात पाने के लिए कई आयामों पर एक साथ काम करने की जरूरत है। सबसे पहले तो भूख से आजादी का जिम्मा सरकारों को लेना होगा और शहर-शहर और गांव-गांव में ‘अम्मा-रसोई’ जैसी व्यवस्था करनी होगी, जिसमें संतुलित आहार हर बच्चे को न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध हो सके।
यह काम कठिन तो है, लेकिन मुश्किल नहीं है। इसे राष्ट्रीय आपदा की तरह देखा जाना चाहिए और समाज को इसमें सहयोग करना अपना नैतिक दायित्व समझना चाहिए। शायद अब भी कोई राष्ट्रीय नेतृत्व इतना प्रभावकारी हो, जिसके आह्वान पर लोग अपने खाने से एक मुट्ठी अनाज जरूरतमंद बच्चों के लिए जमा कर सकें और अपने मानवीय नैतिक दायित्व का पालन कर सकें।
मुझे मालूम है कि इन बातों को सुनकर कोई भी कह सकता है कि भारत में तो ऐसी अनेक समस्याएं हैं, आखिर किस-किस के लिए क्या-क्या किया जा सकता है। लेकिन, मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत की और कोई भी समस्या इतनी गंभीर और अनैतिक नहीं है। यहां तो उन बच्चों की जिंदगी का सवाल है, जिन्हें इस ‘धनी देश’ में भोजन नसीब नहीं है, और जो जीवनभर विकलांगता में जीने के लिए बाध्य हैं। हमें इसका नैतिक दायित्व तो लेना ही होगा।

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