इलाहाबाद का असल नाम बहाल

विजय कुमार

उ.प्र. सरकार ने संगम नगरी के युगों-युगों से प्रचलित पुराने नाम ‘प्रयागराज’ को बहाल कर दिया है। आजादी के बाद से सभी देशभक्त यह मांग कर रहे थे। लोगों को लगता था कि नेहरू का संबंध यहां से खास है। पर वे ठहरे परम सेक्युलर। उन्होंने इस पर कान नहीं दिया। इसके बाद उ.प्र. में भाजपा सरकारों के समय इस मांग ने जोर पकड़ा। पर कभी प्रदेश में गठबंधन सरकार होती थी, तो कभी केन्द्र में। अब दोनों जगह भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है। अत: योगी ने निर्णय ले लिया। पर इससे सेक्युलरों के पेट में दर्द होने लगा है। उन्हें लगता है कि यदि अभी वे चुप रहे, तो न जाने प्रदेश और देश में कितने नाम बदल दिये जाएं ? अत: इस पर कोई सर्वसम्मत नीति बननी चाहिए।
असल में नाम परिवर्तन के पीछे राजनीतिक और सामाजिक कारण हैं। जब विदेशी व विधर्मी हमलावर आये, तो उन्होंने कई स्थानों के नाम बदल दिये। इसका पहला उद्देश्य तो हिन्दुओं का अपमान था। अत: प्रयाग और अयोध्या को इलाहबाद और फैजाबाद किया गया। कोशिश तो उन्होंने हरिद्वार, मथुरा, काशी और दिल्ली को बदलने की भी की; पर वह चाल विफल हो गयी। दूसरा उद्देश्य खुद को या अपने किसी पूर्वज को महिमामंडित करना था। जिस नाम के साथ ‘बाद’ लगा हो, उसकी यही कहानी है। अकबराबाद, औरंगाबाद, हैदराबाद, सिकंदराबाद, गाजियाबाद, तुगलकाबाद, रोशनाबाद, अहमदाबाद..जैसे हजारों नाम हैं। जैसे फैजाबाद अर्थात् फैज द्वारा आबाद; पर सच ये है कि ये स्थान उन्होंने आबाद नहीं बरबाद किये हैं। इसलिए ‘फैजाबाद’ को ‘फैज बरबाद’ कहना चाहिए।
कुछ अति बुद्धिवादी कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने सैंकड़ों साल राज किया है। अत: उन्होंने नये गांव और नगर बसाये ही होंगे। उनके नाम पर प्रचलित महल, मकबरे और मस्जिदों के लिए भी यही कहा जाता है; पर वे यह नहीं बताते कि यदि सब स्मारक उन्होंने बनाये हैं, तो हिन्दू शासक क्या जंगल में रहते थे ? यदि नहीं, तो उनके महल और मंदिर कहां हैं ?
सच ये है कि इस्लामी हमलावर सदा हिन्दू राजाओं से या फिर आपस में ही लड़ते-मरते रहे। उन्हें नये निर्माण की फुरसत ही नहीं थी ? उनके साथ लड़ाकू लोग आये थे, वास्तुकार और कारीगर नहीं। अत: उन्होंने तलवार के बल पर पुराने नगर और गांवों के नाम बदल दिये। महल और मंदिरों में थोड़ा फेरबदल कर, उन पर आयतें आदि खुदवा कर उन्हें इस्लामी भवन बना दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार पी.एन. ओक ने इस पर विस्तार से लिखा है। जब अंग्रेज आये, तो कई शब्द वे ठीक से बोल नहीं पाते थे। अत: शासक होने के कारण उनके उच्चारण के अनुरूप मैड्रास, कैलकटा, बंबई, डेली.. आदि नाम चल पड़े। अब इन्हें चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली कहते हैं। कानपुर, लखनऊ, बनारस आदि की वर्तनी (स्पेलिंग) भी अंग्रेजों ने बिगाड़ दी। कांग्रेस राज में नामों की धारा एक परिवार की बपौती बन गयी। अत: हर ओर गांधी, नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और सोनिया नगरों की बहार आ गयी। यहां यह पूछा जा सकता है कि आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा बदले नाम ठीक करने में ही शासन ने रुचि क्यों ली ? असल में भारत में ईसाई वोटों की संख्या बहुत कम है। उनसे सत्ता के फेरबदल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; पर मुस्लिम वोटों के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए राजनीतिक दल मुस्लिम शासकों द्वारा बदले गये नामों को नहीं छेड़ते। उ.प्र. में मायावती ने ऊधमसिंह नगर, ज्योतिबाफुले नगर, गौतमबुद्ध नगर आदि कई नये जिले बनाये; पर लोग इन्हें यूएस नगर, जेपी. नगर और जी.बी. नगर ही कहते हैं। हाथरस बनाम महामाया नगर और लखनऊ के किंग जार्ज बनाम छत्रपति शाहू जी महाराज मेडिकल कॉलेज के बीच तो कई बार कुश्ती हुई। अब भाजपा सरकार ने उ.प्र. में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन’ किया है। क्योंकि 11 फरवरी, 1968 को दीनदयाल जी का शव वहां पर ही मिला था। पर खतरा ये है कि यह समय के प्रवाह में कहीं डीडी जंक्शन न हो जाए। कई नामों के पीछे इतिहास और भाषायी गौरव जुड़ा होता हैं; पर जुबान का भी एक स्वभाव है। वह कठिन की बजाय सरल शब्द अपनाती है। इसलिए भोजपाल, जाबालिपुरम् और गुरुग्राम क्रमश: भोपाल, जबलपुर और गुडग़ांव हो गये। मंगलौर (मंगलुरू), बंगलौर (बंगलुरू), मैसूर (मैसुरू), बेलगांव (बेलगावि), त्रिवेन्द्रम (तिरुवनंतपुरम), तंजौर (तंजावूर), कालीकट (कोझीकोड), गोहाटी (गुवाहाटी), इंदौर (इंदूर), कोचीन (कोच्चि), पूना (पुणे), बड़ोदा (बड़ोदरा), पणजी (पंजिम), उड़ीसा (ओडिसा), पांडिचेरी (पुडुचेरी) आदि की भी यही कहानी है। अब शासन भले ही इन्हें बदल दे; पर लोग पुराने और सरल नाम ही सहजता से बोलते हैं।
अत: विदेशी हमलावरों द्वारा बिगाड़े नाम हटाकर ऐतिहासिक नाम फिर प्रचलित करने चाहिए। इससे अपने इतिहास का पुन: स्मरण भी होगा; पर सहज बोलचाल के कारण प्रचलित हो गये नाम बदलने की जिद ठीक नहीं है।

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