केरल सरकार के निशाने पर धार्मिक संस्थाएं

तरुण विजय

जब हिंदुओं को किसी शक्ति और सफलता का तनिक अनुभव होता है वे सामूहिक शत्रु के विरुद्ध एकजुटता अथवा अपनी हिंदू-संगठन शक्ति बढ़ाने के बजाय हिंदू समाज के भीतर अपने व्यक्तिगत विरोधियों के खिलाफ विद्वेष और प्रतिशोध से काम करना शुरू कर देते हैं। यह हिन्दू इतिहास की विडम्बना रही है। अगर गुरु तेग बहादुर साहब, गुरु गोविंद सिंह और उनके महान साहबजादों का साका और बलिदान न हुआ होता तो हिन्दुओं का सफाया हो गया होता। पर उनकी कथाएं, उनके चित्र किसी मंदिर में दिखते हैं क्या? आज भी हिन्दू संगठन जलसों, कार्यक्रमों में व्यस्त पर केरल में हिन्दू मंदिरों में अहिन्दू नियुक्तियों के कानून की भयावहता से अनजान हैं।
केरल में वहां की सरकार ने एक कानून पास किया है जो अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक है। इस कानून की असलियत और इसके प्रभाव को समझने में भी विश्वास करना कठिन लगता है। उदाहरण के लिए यदि कहा जाये कि सरकार किसी जामा मस्जिद को अपने सरकारी नियंत्रण में लेकर एक कानून पास कर दे कि कोई गैर मुसलमान जैसे कि कोई पंडित हरी प्रसाद उस मस्जिद के इमाम या प्रबंधक के नाते नियुक्त किये जा सकते हैं तो कैसा लगेगा? सब लोग निर्विवाद रूप से कहेंगे कि ऐसा हो नहीं सकता। ऐसा संभव नहीं। सुझाव देकर देखिये। बम फट जायेंगे, गर्दन कट जायेगी और सेकुलर मीडिया शब्द हिंसा से आपका कीमा बना देगी। कोई बचाने भी नहीं आयेगा। आपके अपने संगी साथी भी आपको पहचानने से इंकार कर देंगे।
ऐसा कोई सुझाव आप ईसाइयों या मुसलमानों के आस्था स्थलों के बारे में नहीं दे सकते। लेकिन हिंदुओं के देव स्थानों के बारे में न केवल ऐसा सुझाव दिया गया बल्कि केरल गजट में प्रकाशित कर असाधारण कानून भी प्रकाशित कर दिया गया कि त्रावणकोर कोचीन हिंदू धार्मिक संस्थान (संशोधन) अधिनियम 2018 के अनुसार इस अधिनियम धारा 29 में यह संशोधन कर लिया गया है कि केरल के मंदिरों की देखभाल के लिए नियुक्त होने वाले आयुक्त का हिन्दू होना आवश्यक नहीं है। पहले से ही हिन्दू मंदिरों की देखभाल और प्रबंधन के लिए गैर हिन्दुओं की नियुक्ति ही नहीं की जाने के प्रयास हुए बल्कि श्री बालाजी तिरूपति मंदिर के प्रबंधन बोर्ड में दो ईसाई नियुक्त भी किये गये जिस पर आपत्ति करने पर मंदिर के मुख्य हिन्दु पुजारी को अपमानजनक ढंग से हटा दिया गया। तब भी देश में कुछ नहीं हुआ।
अब त्रावणकोर कोचीन हिंदू रिलीजिययस संस्थान संशोधन अधिनियम सारे देश के हिन्दुओं के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है लेकिन हमारे महान हिन्दू महापुरुष और नेता सूचियां बनाने, नाम काटने, काली सूचियां बनाने और अपने भीतरी दायरों में जिन-जिन से उनके विद्वेष, वैमनस्य, नाराजगी, नापसंदगी थी उनको सत्ता के स्पर्श वाले अपने बूटों तले कुचलने में व्यस्त हैं। हिन्दू जीवन को प्रस्तुत हो रही नित्य नवीन चुनौतियों के संबंध में जलसे और ट्वीट हो रहे हैं। कहीं भी हिन्दू कर्णधार इस विषय में चिंता करते नहीं दिखते कि अपनी मानसिकता और जीवन पद्धति बदलना जरूरी है।
अब यह देखिये केरल सरकार का हिन्दू धार्मिक मंदिरों की देखभाल के लिए अहिन्दुओं की नियुक्ति को वैधानिक ठहराने वाला काला कानून राज्यपाल के आदेश से 6 जुलाई, 2018 को अधिसूचित हुआ तथा सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया गया। सवाल यह है कि हिन्दुओं को ही सेकुलर संविधान की सेकुलर संस्थाएं अपने सेकुलर सुधारों के तमाशे के लिए प्रयोगशाला क्यों बना रही हैं? हिन्दुओं में धार्मिक पाखंड तथा जातिवाद का जहर इतना बढ़ता गया है कि एक हिन्दू के नाते, एक हिन्दू समाज के नाते अन्य क्षेत्र के हिन्दुओं की वेदना बाकी भी महसूस करें ऐसा अब स्वाभाविक रूप से होता नहीं है। आपसी विद्वेष और कलह में हमने बड़े-बड़े युद्ध हारे हैं। केरल सरकार द्वारा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं पर अहिन्दुओं को लादने का काला कानून हिन्दुओं की अपनी जड़ता और जातिवादी वैमनस्य के कारण संगठित न हो पाने का परिणाम है।

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