जिद… सच की- देश में बढ़ते वृद्धाश्रम खतरे की घंटी

अहम सवाल यह है कि इतनी भारी संख्या में वृद्धाश्रमों की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या एकल परिवार के प्रति लोगों की बढ़ती दिलचस्पी इसकी मुख्य वजह है? पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की पूजा करने वाले समाज में अपने ही बुजुर्गों के प्रति इतनी निष्ठïुरता कैसे आ गई? क्या भौतिकवाद की अंधी दौड़ ने रिश्तों के प्रति लोगों को संवेदनशून्य बना दिया है?

Sanjay Sharma

देश में परिवार और सामाजिक सुरक्षा का ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने लगा है। दरकते रिश्तों ने उपेक्षित और प्रताडि़त बुजुर्गों की संख्या इतनी बढ़ा दी है कि उनके लिए वृद्धाश्रम कम पडऩे लगे हैं। ऐसे बुजुर्गों के लिए केंद्र सरकार ने हर जिले में वृद्धाश्रम खोलने का फैसला किया है। सरकार का यह प्रयास निश्चित तौर पर सराहनीय है। बावजूद इसके किसी भी स्वस्थ समाज के लिए बुजुर्गों की उपेक्षा खतरे की घंटी है। अहम सवाल यह है कि इतनी भारी संख्या में वृद्धाश्रमों की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या एकल परिवार के प्रति लोगों की बढ़ती दिलचस्पी इसकी मुख्य वजह है? पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की पूजा करने वाले समाज में अपने ही बुजुर्गों के प्रति इतनी निष्ठïुरता कैसे आ गई? क्या भौतिकवाद की अंधी दौड़ ने रिश्तों के प्रति लोगों को संवेदनशून्य बना दिया है? आखिर वृद्ध माता-पिता बोझ क्यों बन गए हैं? क्या संतान का अपने माता-पिता के प्रति कोई दायित्व नहीं है? क्या कड़े कानून के अभाव में बुजुर्ग दर-दर भटकने के लिए मजबूर हैं?
भौतिकवाद की अंधी दौड़ का असर भारतीय समाज पर भी दिखने लगा है। शहरों के विकास और गांव की उपेक्षा ने संयुक्त परिवार की नींव हिला दी है। लोग कमाने-खाने के लिए शहरों में पहुंचे और यही परिवार समेत बस गए। इस परिवार में पति-पत्नी और बच्चे शामिल हैं। चाचा, ताऊ जैसे रिश्तों को एकल परिवार में कोई जगह नहीं मिली। जहां दादा-दादी हैं, वे भी उपेक्षित हैं। पिता-पुत्र और सास-बहू की सोच में पीढ़ी का अंतर है। इस अंतर ने टकराव उत्पन्न किया और नई पीढ़ी ने पुरानी को बाहर कर दिया। अधिकांश घरों में बुजुर्ग उपेक्षित हैं। उनसे मारपीट तक की जाती है। तमाम लोग बिना किसी संकोच के अपने बूढ़े मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आए हैं और कुछ बुजुर्ग खुद वहां चले गए हैं। ऐसे बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के अनुपात में वृद्धाश्रम नहीं है लिहाजा वे विपरीत परिस्थितियों में रहने को बाध्य हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक इस समय बुजुर्गों की संख्या कुल जनसंख्या का 12 फीसदी है, जो 2020 तक 16 फीसदी हो जाएगी। वहीं दूसरी ओर देश के कुल 718 जिलों में से 488 जिलों में वृद्धाश्रम नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि बुजुर्गों को अपने बेटों और समाज को देने के लिए कुछ नहीं है। उनके पास अथाह अनुभव है, जिसके सहारे तमाम समस्याओं का निदान किया जा रहा है। परिवार के भीतर ऊर्जा महसूस की जा सकती है। इसके अलावा यह भी सच है कि बुजुर्गों को उपेक्षित कर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सका है। लिहाजा अपनों की इस उपेक्षा पर समाज को गहराई से चिंतन करने की जरूरत है।

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