शराब की बिक्री में धड़ल्ले से चल रहा लूट का खेल, सो रहे आबकारी विभाग के जिम्मेदार

  • प्रिंट रेट से अधिक दाम पर बेची जा रही शराब और बीयर
  • अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से चल रहा धंधा
  • शिकायत के बाद भी जांच और छापेमारी की नहीं होती कार्रवाई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। एक तरफ जहां प्रदेश सरकार आबकारी विभाग में पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रही है वहीं दूसरी तरफ आबकारी विभाग की नाक के नीचे खुलेआम लूट मची है। शराब और बीयर प्रिंट रेट से अधिक मूल्य पर धड़ल्ले से बेची जा रही है। जब प्रदेश की राजधानी लखनऊ में यह आलम है तो अन्य जनपदों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
राजधानी का शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण, हर जगह शराब और बीयर की दुकानों पर ग्राहकों को लूटा जा रहा है। 110 रुपये की बीयर को 120 रुपये में बेचा जा रहा है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 130 रुपये तक वसूला जा रहा है। वहीं शराब की कीमत प्रिंट रेट से अधिक वसूली जा रही है। अधिक रुपये नहीं देने पर दुकानदार शराब नहीं देता है। दबंगई का आलम यह है कि दुकानदार कार्ड से भी अधिक रुपये लेते हैं यानि कुल मिलाकर यदि यह कहें कि यह लूट का धंधा हर अधिकारी की नजर में है तो गलत नहीं होगा। कार्ड द्वारा यदि अधिक रुपये वसूले जा रहे हैं तो स्वाभाविक है कि इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक के अधिकारियों की मिलीभगत है। हैरानी की बात यह है कि प्रिंट रेट से अधिक मूल्य पर शराब बेचने के मामले को लेकर कई बार गोपनीय तरीके से भी अधिकारियों को सूचना दी गई है। बावजूद इसके कोई जांच नहीं की गई और न ही किसी प्रकार की छापेमारी हुई।

कई बार हो चुकी है मारपीट

शराब की दुकानों पर आये दिन इस मामले को लेकर दुकानदारों व ग्राहकों में झड़प होती रहती है। कई बार यह मामला मारपीट में तब्दील हो चुका है। लोकल पुलिस ग्राहक को ही प्रताडि़त करती है। ग्राहक को धमकी दी जाती है कि चुप हो जाओ नहीं तो तुम्हारे ही खिलाफ कार्रवाई कर दी जाएगी।

प्रमुख सचिव से नहीं कराई गई बात

इस बारे में जब प्रमुख सचिव आबकारी कल्पना अवस्थी से बात करने का प्रयास किया गया तो उनके मातहतों ने बात नहीं कराई। कई बार उनके कार्यालय में फोन किया गया इसके बाद भी बात नहीं हो पाई। मातहतों का कहना है कि मैडम जब भी खाली होगी बात करा दी जाएगी लेकिन कई दिन व्यतीत होने के बाद भी कोई कॉल नहीं आई।

जिला आबकारी अधिकारी का नहीं उठता फोन

इस बारे में जब भी जिला आबकारी अधिकारी के सीयूजी नंबर पर कॉल की गई उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। कई कॉल के बाद भी कॉल रिसीव नहीं होने का मतलब साफ है कि उनको पता है कि कोई शिकायत करेगा और उनको कार्रवाई करनी पड़ेगी। यदि कभी किसी अधिकारी से इस बारे में बात होती है तो अधिकारी भी यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेते है कि क्या पांच और दस रुपये के लिए बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं। दस रुपये की बात है। देकर ले लीजिए।

दुकानों पर नहीं अंकित है किसी अधिकारी का नंबर
थानों पर यदि शिकायत की सुनवाई नहीं होती है तो वहां बड़े अधिकारियों का नंबर लिखा रहता है लेकिन शराब की दुकानों पर किसी भी अधिकारी का नाम और नंबर नहीं लिखा रहता है। इससे ग्राहक शिकायत भी नहीं कर पाते हैं।

बदनामी के डर से नहीं करते शिकायत
कई ग्राहक बदनामी के डर से तो कुछ समय के अभाव में इसकी शिकायत अधिकारियों से नहीं कर पाते हैं। इससे दुकानदारों का हौसला बढ़ गया है। इसका फायदा दुकानदारों को मिलता है। यदि दुकानदार से इस बाबत पूछा जाता है तो वह साफ शब्दों में कहता है कि संचालक और अधिकारियों के कहने पर ही इस तरह बिक्री की जाती है।

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