वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम से मीडिया मालिकों की नाराजगी का कारण

अजीत अंजुम

ताव! मेरे जीवन का फलसफा है ताव। ताव मेरा ऑक्सीजन है। ताव रहबर है। ताव ही मेरी ऊर्जा है। मैं जो भी हूं, इसी ताव की वजह से। जो नहीं हूं, वो भी इसी ताव की वजह से। ताव आया तो एक दिन में तीन फिल्में देख ली। ताव आया तो एक दिन में पूरी किताब खत्म कर दी। ताव आया तो बिना प्लान के मिनटों के नोटिस पर घूमने चल दिए। ताव आया तो दफ्तर नहीं गए। ताव आया तो तीन दिन का काम एक दिन में खत्म कर दिया। ताव आया तो किसी से झगड़ लिए। ताव आया तो लगातार सोलह घंटा गाड़ी चलाकर कहीं पहुंच गए। ताव आया तो लाखों की नौकरी पल भर में छोड़ दी। ताव आया तो पूरे दिन किताबें खरीदने में बिता दिया। ताव आया तो एक ही दिन में पांच लेख लिख मारे। ताव आया तो अगली सुबह के इंतजार में पूरी रात सो ही नहीं पाया। ताव आया तो टीवी का कोई दुरुह काम दूसरों से आधे वक्त में करके दिखा दिया। ताव आया तो मैनेजमेंट की तरफ से थोपी गई किसी महिला सलाहकार को मुंह पर कह दिया कि कम से कम आपसे तो ब्रेकिंग न्यूज का मतलब नहीं सीखूंगा, जिसे अखबार पढ़े हफ्तों हो जाते हों और देश के पांच मुख्यमंत्रियों का जिसे नाम न पता हो।
कहने का मतलब मेरे व्यक्तित्व का संचालन बहुत हद तक ये ताव ही करता है। कहने-सुनने में ये नकारात्मक भी लग सकता है। है भी। मेरे जीवन में इस ताव के न जाने कितने रूप हैं। जीवन मे जो पाया, ताव की वजह से। जो खोया, वो भी ताव की वजह से। मेरे दोस्त लोग मुझे बेचैन आत्मा कहते हैं। उतावलापन लिए एक ऐसा आदमी जो कभी भी कुछ भी कर सकता है। मुझसे मजे भी लेते हैं कि यार, आप भी न, बड़े कमाल के हो। ताव आया नहीं कि आप वो काम करने लगते हो, जो पहले आपको करना नहीं था। मैं दोस्तों के तंज और अपने बारे में उनके मूल्यांकन को मान लेता हूं कि हां मैं ऐसा ही हूं। मैं खुद अगर अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व की व्याख्या करुं तो इस ताव के बगैर मैं ‘रंगहीन’ हूं।
मेरे लिए मेरा ताव, मेरी ऊर्जा का गर्भगृह है। स्रोत है। जिद है। ताकत है। उत्साह है। जीवन है। पहचान है। हां, मैं उस ताव को त्यागना चाहता हूं, त्याज्य मानता हूं, जो दूसरों का दिल दुखाता है या मेरे भीतर गुस्सा पैदा करता है। वक्त के साथ-साथ बहुत हद तक मैं इसमें कामयाब भी हुआ हूं। अब मेरे पास ‘ताव’ का वो हार्ड बाउंड संस्करण नहीं है, जो बीस-पच्चीस साल पहले था। वक्त ने सबकी तरह मुझे भी बदल दिया है।
इस ताव के नकारात्मक पहलू को देखें तो मेरा इससे बहुत नुकसान भी हुआ है। बहुत से लोगों की नाराजगी मोल ली है और न चाहते हुए भी कई ऐसे सहयोगियों या वरिष्ठों का दिल दुखाया है, जिसका तुरंत मुझे मलाल होता रहा है। ताव के पिघलते ही मैंने कई बार ऐसी गलतियों के लिए मिनटों के भीतर माफी भी मांगी है। कई बार अपने को करेक्ट करने की कोशिश भी की है। उस ताव से तो मैंने मुक्ति पाने की कई बार कोशिश की है लेकिन कुछ तो इनबिल्ट है, जो इंजन के साथ कब गरम हो जाता है, मुझे भी नहीं पता चलता है। ताव की वजह से मुझे बहुत कुछ ऐसा नहीं मिल पाया, जो दूसरों को मिला। ताव की वजह से संस्थानों के मालिक मुझसे नाराज भी रहे। सकारात्मक देखूं तो अगर ये ताव न होता तो बेगूसराय से अपने दम पर दिल्ली में जमीन तलाशने आया एक लडक़ा, जिसके पास दिल्ली के किसी नामधारी कॉलेज की न तो डिग्री थी, न ही कोई सोर्स या रिसोर्स, फिर भी किसी तरह से लड़ते-जूझते थोड़ी बहुत पहचान बनाने में कामयाब न हुआ होता। ताव न होता तो सालों तक सोलह-सोलह घंटे काम न करता। ताव न होता तो चुनाव के दौरान ‘पोलखोल’ जैसे चुनौतीपूर्ण कार्यक्रम को नंबर वन बनाने के लिए दो महीने तक ऑफिस में डेरा डालकर पड़ा नहीं रहता। ताव न होता तो किसी प्रोड्यूसर के ये कहने पर कि ‘इतने कम समय में आधे घंटे का शो कैसे बनेगा’ खुद उतने वक्त में शो लिखने की जिम्मेवारी लेकर खुद को साबित करने की जिद न ठानता। ताव न होता तो मूर्ख सीईओ को मुंह पर कहने की हिम्मत नहीं करता कि आपका एडिटोरियल मीटिंग में आना मुझे कबूल नहीं। ताव न होता तो बीस सालों में दर्जनों नए तरह के शोज न बनाए होते। ताव न होता तो लॉगिंग करने से लेकर लाइटिंग के लिए कटर स्टैंड लगाने को भी अपना काम मानकर खुश न रहता।
ताव न होता तो मैं भी दिल्ली के कई दरबारी पत्रकारों की तरह सत्ताधीशों के यहां सुबह -शाम हाजिरी लगाता। ताव न होता तो यूपीए के दौर में कांग्रेस नेताओं की महफिल का नगीना बना रहता और बीजेपी के दौर में ‘राष्ट्रवादी’बनकर स्वनामधन्य हो जाता। ताव न होता तो किसी ताकतवर मंत्री को सार्वजनिक मंच पर उनके दोमुंहेपन के मायने न समझा पाता। ताव न होता तो मैं भी वीवीआईपी दिवाली मिलन में बाड़े में खड़े होकर पीएम के साथ सेल्फी लेकर खुश हो लेता या बाड़े के इस पार से मोदी जी से हाथ मिलाकर धन्य हो लेता। नहीं बैठा कभी नेताओं की ऐसी अंतरंग महफिलों में, जहां लहालोट होते हैं हमारे कई साथी। ताव ही है कि मुझे अपने पैरों पर टिकाए रखता है। कभी लडख़ड़ता भी हूं तो यही ताव फिर मुझे खड़ा कर देता है। ताव न होता तो मैं भी कुछ बड़े पत्रकारों की तरह मोदी, शाह, योगी, सोनिया, राहुल, अखिलेश या किसी और को खुश करने की कवायद करता रहता। ताव न होता तो अपने लिखे की वजह से सोशल मीडिया पर पडऩे वाली गालियों से परेशान हो जाता। ये ताव ही है कि मैं बड़ों -बड़ों को ज्यादा भाव नहीं देता अगर वो ‘बड़े’ जैसे बनते हैं तो।
ताव न होता कि शहर में अपने अशुभचिंतकों की बद्दुआओं के बाद भी यूं जिंदा न रहता। ताव न होता तो समय-समय पर मेरा मर्सिया लिखने वाले दुश्मन कब के कामयाब हो गए होते। बीते दस सालों में कई बार जलनशील टाइप के कुछ प्राणियों ने मेरे खिलाफ सोशल मीडिया या किसी वेबसाइट पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से मुहिम चलाई। मेरे बारे में क्या-क्या नहीं लिखा लेकिन ताव ही था कि उनके लिखे को हजम करता हुआ आगे बढ़ता रहा और वो अपने दड़बे में बैठकर मुझे श्राप देते रहे। मेरे विनाश की अतृप्त तम्मनाएं पाले बैठे रहे।
मैं जानता हूं कि इंडिया टीवी की नौकरी कैसे एक मिनट के फैसले पर छोड़ दी। सुबह उठा और तय किया कि आज के बाद मैं इस चैनल का हिस्सा नहीं हूं। मैसेज और मेल के साथ सार्वजनिक ऐलान भी कर दिया कि मैं संस्थान छोड़ रहा हूं। ताव में इस्तीफा कुछ महीने पहले भी दिया था लेकिन लंबी बातचीत के बाद रुक गया। भीतर ही भीतर अपने ताव को नियंत्रित करता रहा लेकिन एक दिन फिर किसी बात पर ताव आया तो जय हिन्द, जय भारत बोलकर निकल गया। उसी दफ्तर के भीतर और बाहर के कुछ भाई लोग तरह-तरह की अफवाह उड़ाकर मेरा मर्सिया लिखते-बुनते रहे और खुश होते रहे। ताव न होता तो नौकरी छोडक़र भी किसी नौकरी वाले से ज्यादा सुकून में न रहता। ये ताव ही तो मुझे जिंदा रखता है। ये ताव दरअसल उकसाता है। अगर आप ताव को सकारात्मक तौर पर लें तो ये ताव आपसे बहुत कुछ करा सकता है। ताव ही है जो आपको उकसाता है कि ये करो। कैसे नहीं करोगे। करोगे तो जरूर होगा।
बचपन में कबीर का लिखा पढ़ा था- ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगा, बहुरि करेगा कब।’ लेकिन हर इंसान में आदत कई बार आज के काम को कल पर टालने की होती है। मुझमें भी है। कई बार किसी काम को लेकर काहिली आ जाती है।फिर अचानक ताव आ जाता है कि अब ये तो अभी या आज ही करना है और ताव वो काम मुझसे करा ले जाता है।
महाबली हनुमान को भी जामबंत ने ताव दिलाकर उकसाया था, तभी उन्हें अपनी ताकत का एहसास हुआ था। वरना उन्हें कहां पता कि वो इतने महाबली हैं। ताव को अगर थोड़े सकारात्मक शब्द से रिप्लेस करें तो एक विकल्प हो सकता है- जिद। जिंदगी में जिद जरूरी है। कुछ पाने की जिद, कुछ करने की जिद, कुछ बनने की जिद, कहीं पहुंचने की जिद। रास्ता कौन सा हो ये व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर है। दो नंबर से दस नंबर तक के तरीकों का इस्तेमाल करके करोड़ों कमाने वाला भी जिद्दी हो सकता है। मैं वैसे दो नंबरियों की बात नहीं कर रहा।
अपनी मंजिल आप खुद तय करें और ताव को जिंदा रखें। कल ताव आया कि मुझे रविवार की इस असलाई सुबह का आगाज अपने दस हजार कदम से करना है। ग्यारह हजार कब पार हुआ, पता ही नहीं चला। वाक करते समय गुरुग्राम से मेरे भाई का फोन आया और जब उसे पता चला कि मैं नौ किमी चल चुका हूं तो लगा हडक़ाने कि यही आपकी दिक्तत है। आप अति कर देते हैं। एक दिन में इतना चलेंगे तो घुटना खराब हो जाएगा। इत्यादि… इत्यादि…मैंने भाईश्री को ये कहकर शांत किया कि मैं तो आज अपने को एक बार फिर चेक कर रहा था। फिर अपने कदम थाम कर घर वापस आ गया। और हां, ताव ने ही मुझसे अभी ये लिखवाया भी है। भाई कॉल बैक के इंतजार में बैठा होगा लेकिन मैंने सोचा पहले लिखूंगा, तब ही बात करुंगा।
मेरे ताव को लेकर मुझसे सबसे ज्यादा मजे लेने वाले मित्र विनोद कापड़ी, साक्षी जोशी, आशुतोष (आशू), संजीव पालीवाल, राजीव कुमार को समर्पित। साक्षी जोशी तो कहती हैं मेरे भीतर हर समय चुल्ल मची रहती है…ताव से ही याद आया पिछले साल भी मैंने वाक करना शुरू किया तो रोज 6 किमी चलता था। एक दिन आनंद विजय ने चुनौती देते हुए कहा कि वो तो 7 किमी चलते हैं। बस अगली सुबह मैं तब तक वाक करता रहा, जब तक घर से फोन न आ गया। रुका तो पता चला 12 किमी पार कर चुका हूं। घर आने पर एहसास हुआ कि छाले भी पड़ गए थे। कई दोस्त मुझे कहते हैं अब तो आप सुधर जाइए। उम्र हो गई। अब तो बड़े हो जाइए। इतना उतावलापन क्यों रहता है आपमें? तो मैं आज उन्हें एक मशहूर शेर अर्ज कर रहा हूं-
उम्र तो सारी कट गई इश्के बुतां में मोमिन,
आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे।।
(लेखक: ब्राडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं)

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