राजधानी की जमीन को खोखला कर रहे वाटर प्लांट, हाथ पर हाथ धरे बैठे जिम्मेदार

  • राजधानी में तेजी से फल-फूल रहा अवैध पैकेज्ड पेयजल का कारोबार
  • अंधाधुंध जलादोहन से कई इलाकों में गिरता जा रहा है भूमिगत जलस्तर
  • बिसलेरी, किनले और किंगफिशर जैसी बड़ी कंपनियों ने भी खास इलाकों में लगा रखे हैं प्लांट

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। शहर में पैकेज्ड पेयजल का अवैध कारोबार धड़ल्ले से जारी है। पूरे साल यह कारोबार चलता है। हालांकि गर्मियों में पैकेज्ड पेयजल की डिमांड बढ़ जाती है। इसके अलावा अवैध रूप से जलादोहन कर टैंकर के द्वारा भी पानी बेचा जा रहा है। शहर में तमाम वाटर प्लांट लगे हैं जो बिना मानक के शुद्ध पानी उपलब्ध कराने का दावा करते हैं। पानी के इस कारोबार से जलादोहन बढ़ गया है। इसके कारण संबंधित इलाकों में पेयजल संकट बढ़ गया है। भले ही शहर के कुछ इलाकों में ग्राउंड वाटर का लेवल कई फीट तक नीचे चला गया हो, लेकिन इससे पैकेज्ड वाटर प्लांट की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। उनका व्यापार दिन दूनी-रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। वहीं इस मामले में जिम्मेदार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
एक अनुमान के मुताबिक शहर में लगे वाटर प्लांटों से रोजाना 90 लाख लीटर ग्राउंड वाटर निकाल कर खुले बाजार में बेचा जा रहा है। हालांकि मौसम के हिसाब से पानी की डिमांड में कमी या वृद्धि होती है। तरह-तरह के मिलते-जुलते नाम से संचालित प्लांट में प्रतिदिन लाखों लीटर से अधिक पानी की निकासी होती है। बाजार में उपलब्ध पैकेज्ड पेयजल ग्लास व पाउच पैक से लेकर 20 लीटर जार तक में उपलब्ध कराए जा रहे हैं। लोगों के घरों, ऑफिस और सार्वजनिक जगहों पर इसका इस्तेमाल कराया जाता है। ग्लास पैक की कीमत तीन रुपये है। 500 एमएल से एक लीटर की बोतल 10 से 20 रुपये में मिलती है। एक अनुमान के मुताबिक रेल नीर व बड़ी कंपनियों के पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर प्लांट को छोड़ भी दें तो पांच दर्जन से अधिक छोटे-बड़े पैकेज्ड पेयजल वाटर प्लांट शहर में चल रहे हैं। खास बात है कि इनमें से कई प्लांट ऐसे मोहल्लों में स्थित हैं, जहां जल स्तर घट रहा है। इसके चलते नगर निगम के हैंड पम्प और बोरिंग सूख चुके हैं। निजी पैकेज्ड वाटर प्लांट की बोरिंग की गहराई अधिक होने से उनको आसानी से पानी मिल जाता है। जानकारों के अनुसार एक प्राइवेट पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर प्लांट से हर दिन औसतन 1.5 लाख लीटर पानी की निकासी होती है। इस हिसाब से देखें तो अनुमानित 60 निजी वाटर प्लांट से हर दिन 90 लाख लीटर पानी निकाल कर बाजार में बेच दिया जाता है। बिसलेरी, किनले और किंगफिशर जैसी बड़ी कंपनियों ने भी खास इलाकों में अपने प्लांट लगा रखे हैं।

नगर निगम की भूमिका पर सवाल

पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर का बढ़ता बाजार नगर निगम की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। जलकल से पानी का कनेक्शन लेने पर सालाना चार्ज देना पड़ता है, लेकिन पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर प्लांट में बोरिंग के लिए नगर निगम और जलकल कोई चार्ज नहीं लेता। पानी के व्यावसायिक प्रयोग के लिए निगम से अनुमति लेनी होती है लेकिन यहां अनुमति लेना तो दूर निगम मेें इसके लिए अब तक एक भी आवेदन तक नहीं आया है। शहर में कितने वाटर प्लांट लगे हैं, इसका कोई आंकड़ा नगर निगम के पास नहीं है।

सप्लाई का फंडा

पैकेज्ड वाटर की सप्लाई का फंडा भी तीन तरह का है। ग्लास व पाउच पैक बड़े-बड़े आयोजनों में इस्तेमाल किये जाते हैं, जहां पर लोगों की संख्या अधिक होती है। बोतलबंद पानी बस स्टैंड व रेलवे स्टेशन से लेकर गली-मुहल्लों की दुकानों में भी मिल जाते हैं। बड़े जार का इस्तेमाल खास कर ऑफिसों में होता है। अब तो शहर के कई आवासीय मोहल्लों में भी बड़े जार की सप्लाई होने लगी है।

गुणवत्ता की गारंटी नहीं
पैकिंग पर आने वाले खर्च के मुकाबले इनकी बिक्री राशि तीन गुना से भी अधिक होती है। बड़ी कंपनियों को छोड़ दें तो लोकल स्तर पर सप्लाई होने वाली पैकेज्ड वाटर की प्यूरिटी की भी गारंटी नहीं होती। पैकेज्ड वाटर की कंपनी को आईएसआई लाइसेंस लेना अनिवार्य होता है, जबकि शायद ही किसी लोकल कंपनी के पैक पर आईएसआई मार्का दिखे।

पाउच से लेकर जार तक में उपलब्ध है पानी
बाजार में उपलब्ध पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर ग्लास व पाउच पैक से लेकर 20 लीटर के जार तक में उपलब्ध हैं। ग्लास पैक की कीमत तीन रुपये होती है। 500 एमएल से एक लीटर की बोतल 10 से 20 रुपये में मिलती है। इसका सबसे बड़ा 20 लीटर का पैक 50 रुपये में आता है।

 

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