जिद… सच की- आयुष्मान भारत योजना के निहितार्थ

सवाल यह है कि क्या सरकार की मंशा के मुताबिक यह योजना जमीन पर उतर पाएगी? क्या अन्य योजनाओं की तरह यह भी लालफीताशाही का शिकार तो नहीं हो जाएगी? इतने अधिक लोगों को निजी और सरकारी अस्पतालों में उपचार उपलब्ध कराने की गारंटी देने वाली इस योजना के लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी? क्या इलाज के नाम पर अस्पतालों में होने वाले भ्रष्टïाचार को रोका जा सकेगा?

Sanjay Sharma

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रांची से दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना आयुष्मान भारत की शुरुआत की। देश के करीब 50 करोड़ लोगों को इसका लाभ मिलेगा। प्रत्येक लाभार्थी को पांच लाख रुपये तक के सालाना उपचार की सुविधा मिलेगी। वे देश के 13 हजार से अधिक अस्पतालों में 1300 बीमारियों का इलाज करा सकेंगे। इसमें दो राय नहीं कि केंद्र सरकार ने एक बेहतर स्वास्थ्य योजना की शुरुआत की है और इसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। बावजूद इसके कुछ सवाल भी हैं। अहम सवाल यह है कि क्या सरकार की मंशा के मुताबिक यह योजना जमीन पर उतर पाएगी? क्या अन्य योजनाओं की तरह यह भी लालफीताशाही का शिकार तो नहीं हो जाएगी? इतने अधिक लोगों को निजी और सरकारी अस्पतालों में उपचार उपलब्ध कराने की गारंटी देने वाली इस योजना के लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी? क्या इलाज के नाम पर अस्पतालों में होने वाले भ्रष्टïाचार को रोका जा सकेगा? क्या योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार ने पुख्ता तंत्र तैयार किया है? क्या यह योजना जनता के कष्टïों को दूर करने में सफल हो सकेगी?
आयुष्मान भारत जैसी योजना देश की जरूरत है क्योंकि यहां गंभीर रोगों का महंगा इलाज करा पाना गरीबों के लिए किसी आपदा से कम नहीं होता। इलाज के लिए गरीब परिवारों को जमीन और घर तक बेचना पड़ जाता है। शहरी क्षेत्र में 24 और ग्रामीण क्षेत्रों में 40 फीसदी लोग आज भी महंगा इलाज नहीं करा पाते हैं और सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं। यहां भी उन्हें राहत नहीं मिल पाती है। कैंसर और किडनी जैसे रोगों के इलाज के लिए उन्हें सरकारी अस्पतालों में महीनों इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में सालाना पांच लाख तक के मुफ्त इलाज की निजी और सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था गरीबों के लिए वरदान से कम नहीं है। बावजूद इसके योजना का लाभ लोगों को मिल सके इसके लिए सरकार को अपना तंत्र सक्रिय करना होगा। अन्यथा अस्पतालों में इलाज के नाम पर रोज घोटाले होंगे। लालफीताशाही पर भी नकेल कसनी होगी क्योंकि कोई भी योजना अफसरों की सक्रियता और ईमानदारी के बिना जमीन पर नहीं उतारी जा सकती। योजना के क्रियान्वयन में पूरी पारदर्शिता बरतनी होगी। योजना को खामियों से मुक्त नहीं कहा जा सकता। इनको दूर करने की तत्परता से ही लोगों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। तमाम सवालों के बावजूद योजना को सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम माना जा सकता है। यदि यह योजना पचास फीसदी भी सफल हो गई तो गरीबों का भला हो सकेगा।

 

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