नये आरएसएस की अवधारणा

आरएसएस विश्व का सबसे बड़ा ‘सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन’ है। वह अपने सिद्धांतों से न कभी फिसला है, न डिगा है। अब एक करोड़ से अधिक आरएसएस के स्वयंसेवक हैं। इसकी 39 देशों में शाखाएं हैं।

 रविभूषण

संभवत: पहली बार समकालीन हिंदी कवि एवं समाजशास्त्री प्रोफेसर बद्री नारायण ने कुछ समय पहले हिंदी-अंग्रेजी के कई लेखों में ‘न्यू आरएसएस’ की बात कही है। इस अवधारणा से यह स्पष्ट होता है कि आरएसएस ने अपने को बदला है और आज का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भिन्न है। पिछले सप्ताह संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने अपने भाषण और पूछे गये प्रश्नों के उत्तर में जो विचार व्यक्त किये हैं, उनसे किसी को भी लग सकता है कि संघ ने समय के अनुसार अपने को बदला है। क्या यह सच है?
साल 1925 से अब तक संघ के उत्थान और विकास के कई चरण हैं, जिसका प्रत्यक्ष संबंध भारतीय जनसंघ और बाद में भाजपा के विकास से है। चौथे लोकसभा चुनाव (1967) में भारतीय जनसंघ को अप्रत्याशित सफलता मिली थी। वह लोकसभा में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। वर्ष 1980 में पुन: इसने एक नयी पार्टी- भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी में केवल नाम का अंतर है। यह आरएसएस का राजनीतिक अंग है। आरएसएस ने सदैव अपने को सामाजिक-राजनीतिक संगठन कहा है। वह जिस ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात करता है, क्या वह किसी राजनीतिक दल के बिना संभव है?
सत्तर के दशक में संघ अधिक सक्रिय हुआ। आडवाणी की रथ यात्रा और राम जन्मभूमि आंदोलन से यह और अधिक शक्तिवान बना। इसके स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री बनना एक बड़ी घटना थी। तब भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं था। बहुमत 2014 के लोकसभा चुनाव में प्राप्त हुआ और इसी के बाद सारा परिदृश्य बदला। साल 2019 के चुनाव के पहले लगभग एक ही समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दाऊदी वोहरा संप्रदाय को संबोधित करते हैं और मोहन भागवत आरएसएस के बदले स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं। क्या संघ ने अपने को सावरकर-गोलवलकर और हेडगेवार-दीनदयाल उपाध्याय के विचारों से मुक्त कर लिया है? क्या वह पहले से भिन्न कोई नयी ‘थीसिस’ प्रस्तुत कर रहा है?
‘हिंदुत्व’, ‘राष्ट्र’, ‘ राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की पूर्व परिभाषा से उसने कोई नयी परिभाषा प्रस्तुत की है? मोहन भागवत ने संघ के तीन दिवसीय आयोजन (17-19 सितंबर, 2018) ‘फ्यूचर ऑफ भारत-ऐन आरएसएस पर्सपेक्टिव’ में जितनी बातें कही हैं, उनसे किसी को भी यह भ्रम हो सकता है कि संघ अब नया रूप ग्रहण कर रहा है। भागवत के अनुसार, बिना मुसलमानों के हिंदुत्व नहीं है। उनका कथन है हिंदु राष्ट्र में मुस्लिम नहीं रहेगा, तो हिंदुओं ने हिंदुत्व को नये रूप में परिभाषित किया है। हिंदुत्व का यह अर्थ-ग्रहण हिंदुइज्म को अपने में समेट लेने पर ही संभव है। हिंदुत्व एक नया निर्मित शब्द है। इस शब्द के अपने स्पष्ट उद्देश्य और लक्ष्य हैं। क्या सचमुच ‘हिंदुत्व’सर्वे भवंतु सुखिन: की अवधारणा में विश्वास करता है? क्या सचमुच ‘हिंदुत्व’ में विश्व बंधुत्व और विश्व कुटुंबकम की धारणा समाहित है? क्या भारत से निकले सभी संप्रदायों का सामूहिक मूल्य-बोध ‘हिंदुत्व’ है? हिंदुत्व के जिन तीन आधारों की बात भागवत ने कही है- देशभक्ति, पूर्वज गौरव और संस्कृति उसके सबके अलग-अलग अर्थ भी हैं। अनेक हिंदू ‘हिंदू’ होने का वह अर्थ ग्रहण नहीं करते, जो ‘हिंदुत्व’ में है। दो वर्ष पहले तक ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात दबे स्वरों में की जाती थी। अब खुलकर की जा रही है, पर बौद्धिक विमर्श में यह कम है। जहां है भी, वह विचार अधिक लोगों तक नहीं पहुंचता।
आरएसएस विश्व का सबसे बड़ा ‘सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन’ है। वह अपने सिद्धांतों से न कभी फिसला है, न डिगा है। अब एक करोड़ से अधिक आरएसएस के स्वयंसेवक हैं। इसकी 39 देशों में शाखाएं हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री तक संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। संघ में प्रतिमाह 8,000 नये स्वयंसेवक शामिल हो रहे हैं। आरएसएस की करीब 56,967 शाखाएं हैं। इस सबके बाद भी आरएसएस को नया रूप क्यों ग्रहण करना पड़ा? सर्वस्वीकार्यता के लिए? सर्वमान्यता के लिए? भारत में शताब्दियों-सहस्त्राब्दियों से नये विचार मौजूद रहे हैं। संघ अब संविधान और लोकतंत्र में आस्था की बात करता है। वह ‘हर तरह के आरचण’ का समर्थन कर रहा है।
वह अनुच्छेद 370 और 35ए की समाप्ति चाहता है।नया आरएसएस सावरकर के हिंदुत्व और गोलवलकर के बंच ऑफ थॉट्स में व्यक्त विचारों से अलग नहीं है। समयानुसार अपने फैलाव को ध्यान में रखकर, आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर, राहुल गांधी द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड से तुलना को ध्यान में रखकर, निश्चित रूप से संघ ने ऊपरी तौर पर थोड़ा-बहुत अपने को बदला है, पर उसका मूल स्वभाव-विचार वही है। वह न बदला है और न कभी उसके बदलने की संभावना है। यह विचार सावरकर-गोलवलकर का विचार है।

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