सवर्णों के आंदोलन ने उड़ाई नींद

अजय कुमार

हिन्दुस्तान की सियासत में जातिवादी गोलबंदी के तहत अगड़ों को दलितों और पिछड़ों से, पिछड़ों को दलितों से, पंडितों को ठाकुरों से, हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ाने का खेल लम्बे समय से चला आ रहा है। इसी प्रकार गरीबों के मन में अमीरों के प्रति नफरत का भाव पैदा किया जाता है। शहरियों और ग्रामीणों के बीच खाई खोदी जाती है। जातियों के बीच दरार पैदा करने के लिये नेतागण अनाप-शनाप बयानबाजी करते हैं तो जरूरत पडऩे पर सडक़ों पर भी उतरने में संकोच नहीं करते हैं। कई ऐसे नेता और दल हैं जिनकी पहचान और सियासत ही जातिवादी राजनीति पर सिमटी है। कोई दलित वोटों के सहारे सत्ता हासिल करना चाहता है तो किसी को अपने पिछड़ा वोट बैंक पर गर्व है। मुसलमान वोटों की ठेकेदारी करने वाले नेताओं एवं दलों की भी कमी नहीं है। याद कीजिये, बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब बहुजन समाज पार्टी की रैलियों में तिलक-तराजू और तलवार को जूते मारने की बात कही जाती थी।
बिहार में लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी एम-वाई (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक के सहारे कई बार सत्ता की सीढिय़ां चढऩे में कामयाब हो चुकी है। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को जीत के लिये मुसलमानों और बंग्लादेशी घुसपैठियों का सहारा रहता है। देश का कोई भी कोना जातिवादी सियासत से अछूता नहीं रहा है। कभी इसे आंदोलन,संघर्ष के माध्यम से हवा दी जाती है तो कभी सरकारी योजनाओं मे बंदरबांट करके इस मुहिम को आगे बढ़ाया जाता है।
खैर, बात आंदोलनों की करें तो आंदोलन से नेता बनते भी हैं और आंदोलनों से नेता सहमते भी हैं, लेकिन पहली बार ऐसे देखने में आ रहा है। जब अनुसूचित जाति/जनजाति एक्ट में संशोधन के विरोध में खड़े हुए अगड़ों और अल्पसंख्यकों के आंदोलन ने मोदी सरकार ही नहीं विरोधी दलों के नेताओं तक को सकते में डाल दिया है। कोई समझ ही नहीं पा रहा है कि वह इस मसले पर क्या स्टैंड लें। सब नफे-नुकसान का आकलन करने में लगे हैं। सबको डर सता रहा है कि कही दलितों के चक्कर में सवर्ण और सवर्णो के चक्कर में दलित नाराज न हो जायें। उधर बीजेपी को उच्च जातियों के संगठनों के आंदोलन में नुकसान की बजाय फायदा नजर आ रहा है। इस मसले पर बीजेपी नेताओं की प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक भी हुई। पार्टी को लग रहा है कि आंदोलन से दलितों में संदेश जा रहा है कि मोदी सरकार ने उनके लिये इतना बड़ा कदम उठाया है। इस तरह सरकार के काम का ही प्रचार हो रहा है। अलबत्ता अब पार्टी ये जरूर सोच रही है कि अपने मजबूत वोट बैंक यानी उच्च वर्गों को लुभाने के लिए क्या किया जा सकता है। फिर भी भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है, वह भूली नहीं है कि किस तरह से बिहार विधान सभा चुनाव के समय आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान के सहारे विपक्ष ने पूरी बाजी पलट दी थी।
बीजेपी के साथ-साथा आरएसएस की भी नींद उड़ी हुई है। दिल्ली में संघ प्रमुख मोहन भागवत का संवाद कार्यक्रम चल रहा है। इसमें वह विभिन्न क्षेत्रों के चुनिंदा लोगों से मिलकर संघ की विचारधारा और विभिन्न मसलों पर अपनी राय से अवगत करा रहे हैं। भागवत ने राष्ट्रीय महत्व के कई ज्वलंत मुद्दों के साथ आरक्षण, राष्ट्र ध्वज समेत कई मुद्दों पर अपनी राय स्पष्ट कर चुके हैं।
सवर्ण संगठनों की ओर से बुलाए गए भारत बंद की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इस बंद को बिना मांगे ही विभिन्न संगठनों का समर्थन मिला। सरकार के सामने परेशानी यह है कि इस आंदोलन का कोई बड़ा नेता नहीं है। सोशल मीडिया पर अपील की जा रही है। मोदी सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एससी-एसटी ऐक्ट में बदलाव के विरोध में खड़े हुए आंदोलन से सौ से ज्यादा संगठन जुड़े हैं। वहीं, करीब 120 संगठनों ने बंद का समर्थन किया था। इनमें पेट्रोल पंप, बड़ी मंडियां और एमपी में प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ लड़ रहा सरकारी कर्मचारियों का संगठन सपाक्स भी शामिल था। इस वजह से जनता को काफी परेशानी भी झेलनी पड़ी थी।
बहरहाल, ऐसा लगता है कि अब समय आ गया है जब आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट पर फिर से विचार करना होगा। दलितों-पिछड़ों को आरक्षण मिले इससे किसी को शिकायत नहीं है, लेकिन जब आरक्षण के नाम पर कथित रूप से ऊंची लेकिन गरीब जनता को उसका हक देने की बजाए दलित/पिछड़ा वर्ग के सांसद/विधायक और बड़े-बड़े अधिकारी आरक्षण की मलाई चट करते हैं तब ऊपरी जाति के दबे-कुचले लोगों में नाराजगी बढ़ती है। इसीलिये आर्थिक आधार पर सभी वर्गों के गरीबों को आरक्षण की बात होती है।

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