अमानवीय चेहरा हुआ उजागर

एक रिकार्ड के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में सात प्रतिशत कैथोलिक पादरी बच्चों के यौन शोषण में लिप्त पाए गए। वर्ष 1950 से 2010 के बीच हुए इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ऑस्ट्रेलिया कैथोलिक पादरी बच्चों के यौन शोषण में लिप्त रहे हैं।

राकेश सैन

पंजाब में केरल मूल के ईसाई धर्मगुरू बिशप फ्रेंको मुलक्कल पर एक नन द्वारा लगाए गए दुराचार के आरोप ने चर्च व प्रशासन के अमानवीय चेहरे को एक बार फिर उजागर कर दिया है। प्रभावशाली धर्मगुरू फ्रेंको पर आरोप लगते ही प्रशासन व चर्च एकदम सक्रिय हो गए परंतु पीडि़त नन को न्याय दिलवाने के लिए नहीं बल्कि आरोपी को बचाने के लिए। किसी पादरी या बिशप द्वारा किया गया यौन शोषण का कोई यह पहला मामला नहीं है परंतु अबकी बार पीडि़त नन इस बात को लेकर तो सौभाग्यशाली रही कि उसे अब समाज, चर्च के भीतर के कुछ लोगों का तो साथ मिला है अन्यथा पहले के मामले तो यूं ही आए गए कर दिए जाते रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में चर्च के भीतर ननों की दुर्दशा को लेकर आ रहे समाचारों को देख कर आज हर ईसाई साध्वी प्रभु ईसा मसीह से यही प्रार्थना करती दिखती है कि -हे प्रभु ! अगले जन्म मोहे ‘नन’ न कीजो।
पंजाब के जालंधर स्थित देश के 145 महत्वपूर्ण बिशपों में से एक फ्रेंको मुलक्कल पर सैक्रेड हार्ट में काम कर चुकी नन ने आरोप लगाए कि उसने 2014 से लेकर 2016 तक दुराचार किया और केवल बलात्कार ही नहीं बल्कि अप्राकृतिक संबंध स्थापित किए। नन ने पहले इसकी शिकायत चर्च को की परंतु वहां उसकी कोई सुनवाई न हुई बल्कि उसे चुप रहने की नसीहत दी गई। काफी संघर्ष के बाद केरल के कोट्टयम जिले के चंगानासरी में न्यायालय में पीडि़ता के बयान दर्ज किए गए। यह मामला सामने आने के बाद अब कई तरह की बातें खुल रही हैं। भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई अन्य देशों से मिले आंकड़ों पर गौर करे तो चर्च दुष्कर्म का अड्डा बन गया है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में आस्था की आड़ में पादरियों ने महिलाओं या ननों के साथ ही, नहीं बल्कि मासूम बच्चियों को भी अपने हवस का शिकार बनाया। पादरी अपनी पहुंच और प्रभाव के चलते कानून के लंबे हाथों को बौना साबित कर चुके हैं। पादरियों पर लोगों की आस्था होती है और प्रशासनिक व राजनीतिक प्रभाव भी। इनके खिलाफ चर्च या कानून के पास शिकायत दर्ज करवाना और न्याय पाना कोई खालाजी का बाड़ा नहीं है। चर्च में पादरियों का निरंतर गिर रहा चरित्र ईसाई समाज के लिए खतरा बनता जा रहा है। एक रिकार्ड के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में सात प्रतिशत कैथोलिक पादरी बच्चों के यौन शोषण में लिप्त पाए गए। वर्ष 1950 से 2010 के बीच हुए इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ऑस्ट्रेलिया कैथोलिक पादरी बच्चों के यौन शोषण में लिप्त रहे हैं। एक अन्य जांच में वहां के करीब 40 फीसद चर्च पर बच्चों के यौन शोषण के आरोप लगे हैं। खास बात यह है कि इसमें से अधिकतर पादरी और धार्मिक गुरू कानून के शिकंजे से आसानी से बच निकलने में सफल भी रहे। कन्फेशन कैथोलिक चर्च के सात संस्कारों में से एक है। माना जाता है कि जब हम कोई गलत काम करते हैं, तो हमारा ईश्वर के साथ नाता टूट जाता है। ऐसे में ईश्वर के साथ दोबारा रिश्ता बनाने के लिए हमें कन्फेशन की जरूरत पड़ती है। ये पादरी कन्फेशन के तहत रूठे ईश्वर को मनाने व अपराध बख्शाने के सेतु माने जाते हैं। यह प्रक्रिया लगभग वैसी है जैसे कि हिंदू धर्म में गंगा स्नान किया जाता है कि जिसके बाद व्यक्ति पापमुक्त माना जाता है। जबकि देखने में आ रहा है कि कई पादरी याची के अपराधबोध को उसकी कमजोरी के रूप में लेते हैं और उसी आधार पर उसे ब्लैकमेल करते हैं। पादरी का यौन उत्पीडऩ करना एक तथ्य है लेकिन चर्च उसे ढंकने के लिए जिस रास्ते पर चल निकला है वो अधिक गंभीर मुद्दा है। देश के कई चर्चों में अपना संविधान चलता है। यहां इस तरह की शिकायत पहले चर्च के अधिकारियों द्वारा की जाती है जिस पर अनावश्यक रूप से लटकाने व भटकाने के आरोप लगते रहे हैं। जांच में आरोप सही मिलने के बाद कानून या पुलिस प्रशासन को शिकायत दर्ज करवाई जाती है। दूसरी दृष्टि में चर्च देश के अंदर एक अलग देश की तरह काम करता है और अपनी व्यवस्था पर लोहावरण चढ़ा कर रखता है। इससे चर्च के अंदर होने वाले अपराध अंदर ही दफना दिए जाते हैं। चर्च व धर्मगुरुओं की आध्यात्मिक छवि, प्रशासनिक व राजनीतिक प्रभाव, समाज पर पकड़ होने के कारण पीडि़तों को अपमान का घूंट पीकर संतोष करना पड़ता है। बदल रही परिस्थितियों में ईसाई समाज व ननों में भी नई चेतना का विकास हो रहा है और बिशप फ्रेंको मुलक्कल पर आरोप लगाने वाली नन ने जिस दृढ़ता से अपनी बात समाज व कानून के सामने रखी उसने चर्च व इसकी पूरी प्रणाली की चूलें हिला कर रख दी हैं।

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