बंद हों ये बुरे बोल

पवन के वर्मा

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये एक नेता हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने तेलंगाना विधानसभा भंग करने की अनुशंसा की, जिसे राज्यपाल ने स्वीकार किया। अपने इस फैसले की घोषणा करते वक्त ही उन्होंने राहुल गांधी पर सीधा हमला करते हुए उन्हें ‘देश का सबसे बड़ा विदूषक’ करार दिया। केसीआर को अपना मत बनाने का हक है, मगर उन्होंने इसे जिस तरह व्यक्त किया, उसे लेकर मेरे लिए एक बुनियादी समस्या है। आज की लोकतांत्रिक सियासत चाहे जितनी भी स्पर्धात्मक एवं कटु हो गयी हो, क्या नेताओं को अपने सार्वजनिक वक्तव्यों पर अपेक्षित संयम की पूरी अनदेखी करने की छूट मिल गयी है? सियासी नेताओं का एक-दूसरे से मतभेद हो सकता है और एक लोकतंत्र में यह न केवल अपरिहार्य, बल्कि वांछनीय भी है। किसी पार्टी अथवा उसके नेता की आलोचना एक अलग चीज है, पर इसे व्यक्तिगत हमले के जरिये ऐसे शब्दों में करना, जिसका भाषाई संयम से कोई संबंध न हो, एक बिल्कुल ही अलग चीज है।
कांग्रेस के एक स्थानीय प्रवक्ता ने उलटकर केसीआर को ही देश के सबसे बड़े एक ऐसे विदूषक की संज्ञा दे डाली, जो हिटलर की तरह व्यवहार करता है। ऐसी बहसें और भी निचले स्तर पर उतर अपशब्दों के इस्तेमाल में बदल सकती हैं। इस विवाद में नागरिक मौन दर्शक बनकर रह जाते हैं। नेतागण उनके वोट तो चाहते हैं, पर ऐसी भाषा के द्वारा वे ऐसा कुछ बिल्कुल ही नहीं करते, जो उनका सम्मान भी जीत सके। हमारे ही देश में एक ऐसा भी वक्त था, जब अत्यंत कटु सियासी विरोध भी सभ्यता से व्यक्त किया जाता है। इससे वह आक्रमण कोई कमजोर नहीं पड़ जाता था। इसके विपरीत, व्यंग्य, कटाक्ष, पर्दा तथा चुटकी के प्रयोग उस हमले को और धार ही दिया करते थे। इसके अलावा, सियासी स्पर्धा का अर्थ नीति तथा सिद्धांत की भिन्नता ही हुआ करता था। एक ही पार्टी के सदस्य होते हुए भी नेहरू और सुभाष में रणनीतियों तथा युक्तियों को लेकर गंभीर मतभेद थे। पर उनके पत्रों को पढऩे से यह साफ पता चलता है कि अपने मतों पर अडिग रहने के बावजूद, सभ्यतापूर्वक असहमत होते हुए उन्होंने अपने संवाद कभी भी अपशब्दों के शिकार न बनने दिये। कई अवसरों पर नेहरू तथा महात्मा गांधी भी एक-दूसरे से असहमत हुए। मगर उनके बीच पत्राचार से भी यह स्पष्ट होता है कि उनकी बहसें भी हमेशा ही मुद्दों को लेकर रहीं, जो कभी गरिमाविहीन दुर्वचनों में नहीं बदल सकीं। संभवत: अटल बिहारी वाजपेयी इसके अन्यतम उदाहरण बने रहेंगे कि हद दर्जे तक उकसाये जाने के बाद भी कोई कैसे अपना भाषाई संयम बनाये रख सकता है। वे आलोचनाओं का जोरदार जवाब हमेशा ही इतनी वाक्पटुता से, मगर ऐसी उत्कृष्टता से दिया करते, जिसका कोई सानी न होता और वह कभी व्यक्तिगत हमले अथवा दुर्वचनों के स्तर तक नहीं उतरता। इसके उलट, व्यंग्य तथा हास्य के सटीक उपयोग की उनकी योग्यता से ऐसी किसी बहस में यह विपक्षी को चित भी कर देता था। इसी वजह से वे भारत के सर्वोत्कृष्ट सांसदों में एक माने जाते थे।
हमारी उस महान सभ्यतामूलक विरासत को यह क्या हो गया है, जिसने हमें गरिमामय ढंग से मतभेद रखना, द्वेषहीन रूप में असहमत होना तथा व्यक्तिगत हुए बगैर हमला करना सिखाया था? भारत एक युवा देश हो सकता है, पर यह प्राचीनतम सभ्यताओं में एक है। यह विश्व की ऐसी पहली सभ्यताओं में रहा है, जिसने हमें शास्त्रार्थ अथवा सभ्यतापूर्ण विवाद की अवधारणा से परिचित कराया। इस अवधारणा के अंतर्गत हम अपने किसी सैद्धांतिक विपक्षी से भी शिष्टतापूर्ण ढंग से संवाद कर सकते थे। सच्चाई यह है कि प्राचीन भारत में लिखे गये महानतम भाष्यों में सैद्धांतिक विपक्षियों के मत भी ससम्मान शामिल किये गये।
अब चूंकि हम वर्ष 2019 के आम चुनावों की ओर बढ़ रहे हैं, हमें भाषाई अपच की कई मिसालें मिलने जा रही हैं. क्रोध चढ़ेगा, नफरत की तकरीरें बढ़ेंगी, व्यक्तिगत हमलों की बहुतायत तथा अपशब्दों की बाढ़ होगी। यदि आरोप अथवा उसके बचाव से वोट मिल रहे हों, तो सत्य तथा असत्य के बीच की भिन्नता भी धुंधली पड़ जायेगी।
किंतु कहीं न कहीं ऐसी मौन प्रार्थना किये जाने की जरूरत भी है कि इस दौरान विवेक को पूरी तरह ताक पर न रख दिया जायेे। क्योंकि एक नेता द्वारा दूसरे को ‘सबसे बड़ा विदूषक बताना’ बहुत गलत है। क्योंकि सियासत के नाम पर पूरे राष्ट्र को द्वेषपूर्ण मसखरी में तब्दील कर दिया जाना अक्षम्य है। हम सभी को, खासकर सियासी वर्ग को यह याद रखने की जरूरत है कि हम एक सुसंस्कृत तथा प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं, न कि बुरे बोलवाले मुट्ठीभर राजनेताओं हेतु खेलने के खिलौने।

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