जिद… सच की पर्यावरण, पौधरोपण अभियान और चिंता

सवाल यह है कि क्या अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार ने इन पौधों की देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित की है? क्या पौधों के पेड़ बनने की उम्मीद की जा सकती है? क्या विभागीय अफसर पर्यावरण सुरक्षा पर गंभीर हैं? क्या अन्य अभियानों की तरह यह भी दिखावा साबित हो जाएगा? क्या आम आदमी के सहयोग के बिना इतने बड़े अभियान को सफल बनाया जा सकता है?

Sanjay Sharma

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रदेश में रिकॉर्ड 9.26 करोड़ पौधे लगाए गए। इन पौधों के रोपण का लक्ष्य केवल हरियाली ही नहीं बल्कि प्रदूषित होते वातावरण को शुद्ध करना भी है। रिकॉर्ड पौधरोपण के लिए विभागीय अफसरों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बधाई भी दी। खुद मुख्यमंत्री ने गोरखपुर के कुसमही वन में पौधरोपण किया। इतनी बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाने से प्रदेश में हरियाली और पर्यावरण के सुधरने की उम्मीद की जा सकती है। इन सबकेे बावजूद कुछ चिंताएं अपनी जगह हैं। अहम सवाल यह है कि क्या अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार ने इन पौधों की देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित की है? क्या पौधों के पेड़ बनने की उम्मीद की जा सकती है? क्या विभागीय अफसर पर्यावरण सुरक्षा पर गंभीर हैं? क्या अन्य अभियानों की तरह यह भी दिखावा साबित हो जाएगा? क्या आम आदमी के सहयोग के बिना इतने बड़े अभियान को सफल बनाया जा सकता है? क्या वाकई रिकॉर्ड पौधे लगाए गए हैं या सारा खेल कागजों पर चल रहा है और यह कुछ दिन बाद उजागर हो जाएगा?
प्रदेश में पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। राजधानी समेत कई शहरों की हवा में जहर घुल चुका है। इसका असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। बच्चों से लेकर वृद्ध तक गंभीर रोगों के शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति प्रदेश में भारी संख्या में पेड़ों के कटान के कारण उत्पन्न हुई है। पेड़ों को काट कर कंक्रीट के जंगल उगा दिए गए हैं। लिहाजा क्षेत्रीय पर्यावरण असंतुलित हो गया है। पेड़ों की कटाई के कारण भूमिगत जलस्तर तेजी से गिर रहा है। इसके कारण पेयजल की किल्लत बढ़ गई है। दरअसल, पेड़ वर्षा जल को अपने जड़ों के जरिए भूगर्भ में पहुंचाते है। इसके कारण जलस्तर में गिरावट नहीं आती है, लेकिन पेड़ों की कमी के कारण जमीन के भीतर पानी का जाना कम हो गया है। दूसरे, पेड़ हवा में फैली नुकसानदायक गैसों को अवशोषित कर लेते हैं लेकिन पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के कारण स्थितियां बिगड़ गई हैं। हवा प्रदूषित हो रही है। सरकार ने इस कमी को पूरा करने के लिए पौधरोपण कार्यक्रम चला रखा है। अभियान के तहत हर साल लाखों पौधे रोपे जाते हैं। हैरत यह कि वर्षों से अभियान चल रहा है लेकिन स्थितियों में बदलाव आता नहीं दिख रहा है। साफ है कि पौधरोपण को लेकर अफसरशाही कागजी खानापूर्ति कर रही है। पौधों को लगाया तो जाता है लेकिन इनकी सुरक्षा का कोई बंदोबस्त नहीं किया जाता है। देखरेख के अभाव में अधिकांश पौधे सूख जाते हैं या वे पशुओं का आहार बन जाते हैं। यदि सरकार वाकई पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है तो इन पौधों की सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित करे अन्यथा यह अभियान दिखावा बनकर रह जाएगा।

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