जिद… सच की- शहरी विकास, सरकारी तंत्र और सवाल

अहम सवाल यह है कि उत्तर भारत के शहरी विकास में बुनियादी तत्वों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया? क्या अफसरशाही की लापरवाही के कारण अधिकांश शहर मनुष्य के रहने लायक नहीं हैं? क्या विकास के नाम पर शहरों में प्रदूषण, दूषित पेयजल, लचर स्वास्थ्य सेवाएं और बेरोजगारों की फौज तैयार की गई? क्या अधिकांश शहर बिना किसी योजना के विकसित हुए हैं? अव्यवस्थित शहरी विकास के लिए क्या सरकार जिम्मेदार नहीं है?

Sanjay Sharma

केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के मानकों पर कसे गए शहरों ने सरकारी तंत्र की पोल खोल दी है। मंत्रालय द्वारा जारी लिस्ट के मुताबिक मनुष्य के बसने के लिहाज से महाराष्टï्र का पुणे देश का सबसे अच्छा शहर है। 111 शहरों की इस लिस्ट में उत्तर भारत के चंडीगढ़ को छोडक़र कोई भी शहर टॉप 20 में जगह नहीं बना सका है। यूपी की राजधानी लखनऊ 73वें और रामपुर आखिरी पायदान पर है। प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी 33वें स्थान पर है। शहरों के इस सर्वेक्षण से कई सवाल उठते हैं। अहम सवाल यह है कि उत्तर भारत के शहरी विकास में बुनियादी तत्वों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया? क्या अफसरशाही की लापरवाही के कारण अधिकांश शहर मनुष्य के रहने लायक नहीं हैं? क्या विकास के नाम पर शहरों में प्रदूषण, दूषित पेयजल, लचर स्वास्थ्य सेवाएं और बेरोजगारों की फौज तैयार की गई? क्या अधिकांश शहर बिना किसी योजना के विकसित हुए हैं? अव्यवस्थित शहरी विकास के लिए क्या सरकार जिम्मेदार नहीं है? क्या आने वाले दिनों में शहरों को मानकों पर खरा उतारने की राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रदर्शन किया जाएगा?
औद्योगिक क्रांति ने शहरीकरण की प्रक्रिया को जन्म दिया। इसका असर भारत सहित पूरे विश्व पर पड़ा और शहरों का विकास तेजी से हुआ। जहां तक भारत का सवाल है, यहां अधिकांश शहरों का विकास बिना किसी योजना के हुआ। हालांकि बाद में कुछ शहरों को योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया। बावजूद इसके भारत में अधिकांश पुराने शहर ही धीरे-धीरे आधुनिक शहरों में तब्दील होते रहे। इन शहरों में औद्योगिक इकाईयों की स्थापना हुई। व्यापारिक गतिविधियां शुरू हुईं। बड़े अस्पताल, चिकित्सा, शिक्षा आदि व्यवस्था शहरों में केंद्रित होती गई। इसके सापेक्ष ग्रामीण क्षेत्रों का विकास नहीं हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि शहरों में जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया। लोग रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा के लिए शहरों में आने को मजबूर हुए। जनसंख्या के बढ़ते दबाव को देखते हुए सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की। लिहाजा शहरों में स्थितियां बदतर होती चली गई। मसलन, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बुनियादी सुविधाएं जनसंख्या के हिसाब से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। शुद्ध पेयजल, साफ-सफाई, चिकित्सा, शिक्षा और सुरक्षा में लखनऊ काफी पीछे रह गया। यहां अनियोजित कॉलोनियों की बाढ़ आ गई है। जलनिकासी की व्यवस्था चौपट हो चुकी है। जाहिर है, इस अनियोजित विकास के पीछे अफसरशाही का लापरवाही पूर्ण रवैया है। यदि उत्तर भारत के शहरों को मनुष्य के रहने योग्य बनाना है तो यहां की राज्य सरकारों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर प्रयत्न करना होगा। बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करना होगा।

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