जिद… सच की->अराजक तत्वों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के निहितार्थ

सवाल यह है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान भीड़ द्वारा सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कोर्ट को आगे क्यों आना पड़ रहा है? क्या ऐसे तत्वों से निपटने में राज्यों की पुलिस नाकाम हो चुकी है? क्या सियासी फायदे के कारण ऐसे अराजक तत्वों पर लगाम लगाने में ढिलाई बरती जा रही है? क्या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने को उचित ठहराया जा सकता है?

Sanjay Sharma

विरोध प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक और निजी संपत्ति के नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पुलिस से ऐसे अराजक तत्वों से सख्ती से निपटने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के लिए वह दिशा-निर्देश जारी करेगी और इससे संबंधित कानून में संशोधन के लिए सरकार का इंतजार नहीं करेगी। अहम सवाल यह है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान भीड़ द्वारा सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कोर्ट को आगे क्यों आना पड़ रहा है? क्या ऐसे तत्वों से निपटने में राज्यों की पुलिस नाकाम हो चुकी है? क्या सियासी फायदे के कारण ऐसे अराजक तत्वों पर लगाम लगाने में ढिलाई बरती जा रही है? क्या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने को उचित ठहराया जा सकता है? पूर्व में जारी कोर्ट के आदेशों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा है? क्या सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना सरकारों का दायित्व नहीं है? क्या आम जनता को भीड़ का बंधक बनने दिया जा सकता है?
पिछले कई सालों से धरना-प्रदर्शन के दौरान देश भर में हिंसक घटनाएं हुईं। पुलिस तंत्र के बावजूद ऐसी घटनाओं में इजाफा हो रहा है। विरोध प्रदर्शन के दौरान हुड़दंगी न केवल आम जनता पर हमला करते हैं बल्कि सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके कारण हर साल करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हो रहा है। पिछले दिनों एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए संशोधन को लेकर दलित समुदाय ने हिंसक आंदोलन किया। झड़पों में कई लोगों की मौत हो गई जबकि करोड़ों की संपत्ति को नष्टï कर दिया गया। हाल में दिल्ली और उत्तर प्रदेश में कांवडिय़ों ने जमकर उपद्रव किया। इस दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। यह स्थिति तब है जब शीर्ष अदालत ने वर्ष 2009 में अपने एक फैसले में कहा था कि प्रदर्शन के आयोजकों को किसी भी प्रकार के नुकसान के लिए जिम्मेदार माना जाएगा। सियासी वजहों से कोर्ट के इस आदेश का पालन नहीं हो रहा है। सत्तारूढ़ पार्र्टी की सरकारें सियासी फायदा लेने के लिए उपद्रवियों से सख्ती से निपटने से कतराती हंै। यदि पुलिस आयोजकों से संपत्ति के नुकसान की भरपाई वसूलने लगे और उपद्रवियों के साथ सख्ती से पेश आए तो इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि वह दलगत नफा नुकसान से ऊपर उठकर उपद्रवियों से सख्ती से निपटे। यदि ऐसा नहीं होगा तो देश और प्रदेश दोनों के विकास पर नकारात्मक असर पड़ेगा। लिहाजा सरकार को विरोध प्रदर्शन को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए।

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