सवर्णों को डराने वाला संविधान संशोधन

प्रेम शर्मा

पहले कोटे पर कोटा यानि आरक्षण के साथ पदोन्नति में आरक्षण यानि जेष्ठता और श्रेष्ठता का आपमान कर चुकी मोदी सरकार ने एक बार फिर वोट बैंक की राजनीति और बहुजन समाज पार्टी से चिपके वोट बैंक को हाथियाने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) कानून में संशोधन किया है। यानि दलितों को लुभाने और सवर्णों को डराने का पूरा प्रयास मोदी सरकार ने किया है। सवाल उठता है कि जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट व्यवस्था दे चुका था और भारत का गृह मंत्रालय लगभग हर साल जारी दलित एक्ट की शिकायतों में से हजारों शिकायतों के फर्जी होने का रिकार्ड देता है तो ऐसे में एक वर्ग विशेष के लिए दूसरे वर्ग के खिलाफ इतनी बड़ी साजिश क्यों रची गई। क्या मोदी जी केवल दलित वोट बैंक के सहारे सत्ता हासिल कर सकते हैं ? मोदी सरकार के इस फैसले के बाद सवर्ण समाज केवल मंदिर और दूसरे दलों की बुराई, लम्बे भाषण, विकास के दावे के आधार पर मोदी और भाजपा से जुड़ा रहेगा या फिर इस अपमान के बदले वह 2019 में अपनी विचारधारा बदल देगा।
मोदी सरकार के एससी-एसटी कानून के तहत अब फिर से किसी भी दलित की तरफ से एससी-एसटी कानून के तहत शिकायत किए जाने पर आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने वाले संशोधन बिल को लोकसभा-राज्यसभा ने मंजूरी दे दी। हालांकि अब भी संशोधन विधेयक को कम से कम 15 राज्यों की विधानसभा से मंजूरी लेनी होगी। उसके बाद ही राष्ट्रपति इसे कानून के तौर पर मंजूर करेंगे। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को एससी-एसटी कानून के गलत इस्तेमाल का हवाला देते हुए शिकायत मिलने पर आरोपी को तत्काल गिरफ्तार करने के प्रावधान पर रोक लगा दी थी। अदालत ने इस मामले में दायर पुनर्विचार याचिका को भी खारिज कर दिया था। कोर्ट के इस फैसले के बाद पूरे देश में दलितों ने सडक़ों पर उतरकर हिंसक आंदोलन किया था। दलित नेताओं और एनडीए के दलित सहयोगियों के जबरदस्त दबाव तथा आगामी चुनावों में दलित समर्थन के गुणा-भाग को ध्यान में रखकर सरकार की तरफ से संशोधन विधेयक लाने का फैसला किया गया था। इस संशोधन विधेयक में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से हटाए गए सभी पुराने प्रावधानों को शामिल किया गया है। एससी-एसटी कानून को वर्ष 1989 में दलितों के प्रति भेदभाव व अत्याचार रोकने के मकसद से लाया गया था। इसके तहत शिकायत को गैर जमानती अपराध माना जाता है। जबकि 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशा निर्देश दिए थेे कि कोई ऑटोमैटिक गिरफ्तारी नहीं होगी, गिरफ्तारी से पहले आरोपों की जांच जरूरी। एफआईआर दर्ज करने से पहले डीएसपी स्तर का पुलिस अधिकारी प्रारंभिक जांच करेगा। इस मामले में अग्रिम जमानत पर भी कोई संपूर्ण रोक नहीं है। गिरफ्तारी से पहले जमानत दी जा सकती है। अगर न्यायिक छानबीन में पता चले कि पहली नजर में शिकायत झूठी है। यदि कोई आरोपी व्यक्ति सार्वजनिक कर्मचारी है, तो नियुक्ति प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बिना और यदि व्यक्ति एक सार्वजनिक कर्मचारी नहीं है तो जिला के वरिष्ठ अधीक्षक की लिखित अनुमति के बिना गिरफ्तारी नहीं होगी। ऐसी अनुमतियों के लिए कारण दर्ज किए जाएंगे और गिरफ्तार व्यक्ति व संबंधित अदालत में पेश किया जाना चाहिए। मजिस्ट्रेट को दर्ज कारणों पर अपने विवेक से काम करना होगा। यदि इन निर्देशों का उल्लंघन किया गया तो ये अनुशासानात्मक कार्रवाई के साथ-साथ अवमानना कार्रवाई के तहत होगा। आखिर सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों में गलत क्या था। सुप्रीम कोर्ट ने यही तो कहा कि इस एक्ट का दुरूपयोग न हो, बिना जुर्म कोई परेशान न हो तो इसमें हर्ज क्या था। लेकिन भाजपा को तो सत्ता ओर बहुमत वो फिर रिकार्ड तोड़ बहुमत का नशा चढ़ा हुआ है। वह देख रही है कि देश का कोई ऐसा हिस्सा नहीं है, जहां दलित समाज के लोग नहीं रहते हों। 2011 के जनगणना के मुताबिक देश में दलितों की संख्या 16.6 प्रतिशत मानी गई है। इसमें दलितों की आबादी का सबसे ज्यादा 20.5 प्रतिशत आबादी उत्तर प्रदेश में है। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर है, जहां कुल दलित आबादी का 10.7 प्रतिशत दलित रहते हैं। 8.2: आबादी के साथ बिहार तीसरे और 7.2 प्रतिशत आबादी के साथ तामिलनाडु चौथे नंबर पर है। इस जनगणना में दलितों की आबादी 20.14 करोड़ बताई गई थी। हालांकि दलित मुद्दों पर काम करने वाले संगठन दलित समाज की संख्या को इससे ज्यादा बताते हैं। उनका आरोप है कि एक साजिश के तहत सरकार द्वारा दलितों की आबादी को कम कर के बताया जाता है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी देश की सत्ता तभी तक कायम है जब तक वह न्याय की कसौटी पर उतरती हो जनहित में काम करती हो लेकिन जनहित को छोडक़र सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए स्वंय हित हावी हो जाए तो देश का फिर भगवान ही मालिक है। अब मोदी सरकार को लेकर जनता में जो मंथन हो रहा है वह चौकाने वाला है। राम मंदिर के नाम पर वह सुप्रीम कोर्ट का बहाना बना रही है।
इतना ही नहीं बंगलादेशियों का मामला उठाया जाता है परंतु अध्यादेश नहीं लाया जाता। धारा 370 का मामला आता है सुप्रीम कोर्ट का बहाना, याद होगा कि पद्मावती फिल्म का विरोध राजपूत समाज करता है तो सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करने की बात यही सरकार कह रही थी, और आज दलितों का मामला आया तो अध्यादेश ले आए। अब ऐसे में राजपूत और स्वर्ण जाति पार्टियों की गुलामी, पार्टी भक्ति, मोदी स्तुति और राममंदिर निर्माण से इतर सोचने पर मजबूर दिख रहे है। यहॉ यह भी तय है कि मायावती या फिर बसपा का जो वोट बैंक है उसें इस तरह के प्रयास से हिलाया भी नही जा सकता।

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