जिद… सच की- स्वच्छ भारत मिशन की हकीकत

सवाल यह है कि मिशन को सफल बनाने की तमाम सरकारी कवायदों पर कौन पानी फेर रहा है? क्या यह योजना भी लालफीताशाही का शिकार हो गई है? क्या संबंधित विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या अफसरों की लापरवाही से सरकार की छवि खराब नहीं होगी? क्या लक्ष्य को प्राप्त करना मुश्किल है? क्या ऐसे ही लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने का सपना देखा जा रहा है?

Sanjay Sharma

प्रदेश में स्वच्छ भारत मिशन जमीन पर उतरता नहीं दिख रहा है। राजधानी लखनऊ सहित दस जिलों में यह मिशन दम तोड़ रहा है। ये जिले शौचालय निर्माण में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। ऐसे में प्रदेश को खुले में शौच मुक्त बनाने की सरकार की योजना सफल होती नहीं दिख रही है। अहम सवाल यह है कि मिशन को सफल बनाने की तमाम सरकारी कवायदों पर कौन पानी फेर रहा है? क्या यह योजना भी लालफीताशाही का शिकार हो गई है? क्या संबंधित विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या अफसरों की लापरवाही से सरकार की छवि खराब नहीं होगी? क्या लक्ष्य को प्राप्त करना मुश्किल है? क्या ऐसे ही लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने का सपना देखा जा रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करना है। यह लक्ष्य भी निर्धारित किया गया था कि महात्मा गांधी की जयंती दो अक्टूबर 2019 को पूरे देश को खुले में शौच मुक्त घोषित किया जाएगा। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूरे देश में तेजी से शौचालयों का निर्माण कराया जा रहा है। यूपी में भी योजना शुरू की गई लेकिन पिछले दिनों जब इसकी समीक्षा हुई तो हकीकत सामने आ गई। शौचालय निर्माण में बांदा, लखनऊ, वाराणसी, उन्नाव, सहारनपुर, कुशीनगर, जौनपुर, एटा, हरदोई और लखीमपुर खीरी की प्रगति बेहद खराब मिली। हैरत की बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी है। वहीं स्मार्ट सिटी बनने की तैयारी कर रही प्रदेश की राजधानी लखनऊ की हालत बेदम है। यह स्थिति तब है जब योजना को जमीन पर उतारने के लिए सरकार ने बजट में कोई कमी नहीं की। साफ है अफसरों की उदासीनता के कारण इन जिलों में योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। एक और कल्याणकारी योजना लालफीताशाही का शिकार हो रही है। लक्ष्य प्राप्ति में महज ढाई माह बचे हैं। यदि ऐसी ही स्थिति बनी रही तो प्रदेश को ओडीएफ शायद ही घोषित किया जा सके। अब यह सवाल भी उठने लगा है कि जिन जिलों में कागजों पर स्थिति को बेहतर दिखाया गया है, क्या वहां वाकई ऐसा हो चुका है? सरकार को यह बात समझनी होगी कि यदि वह जनकल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारना चाहती है तो उसे अफसरशाही पर सतत निगरानी रखनी होगी। केवल समीक्षा बैठकों से काम नहीं चलने वाला है। ऐसे कामों की मौके पर पहुंचकर निरीक्षण करने की भी व्यवस्था करनी होगी। यदि संबंधित विभागों की जवाबदेही तय नहीं की गई तो योजनाओं को पलीता लगता रहेगा और सरकार मूकदर्शक बनी रहेगी।

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