ईरान से प्रगाढ़ संबंध बनाए भारत

तरुण विजय

यदि यह मान भी लिया जाए कि अमेरिका ने भारत के साथ द्विपक्षीय रक्षा और विदेश मंत्रियों की बैठक किसी ‘देवी उल्का-पात’ के कारण टाली, तो भी राष्ट्रसंघ में अमेरिकी राजदूत निकी हैले की दिल्ली यात्रा में भारत से अमेरिकी परेशानियां जाहिर हो गयीं। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत ईरान के साथ संबंध रखे.. और वह रूस से 4.5 अरब डालर की लागत से खरीदे जा रहे विमान भेदी प्रक्षेपास्त्र रक्षा-व्यवस्था-टायम्फ-5 के खिलाफ भारत पर प्रतिबंध लगाने का संकेत दे चुका है। ये प्रतिबंध अमेरिका द्वारा पारित ‘अमेरिकी के विरोधी-प्रतिस्पर्धियों के प्रतिरोध हुते प्रतिबंध कानून’ के अंतर्गत लगाए जाएंगे।
निकी हैले ने दिल्ली में कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्पष्ट कहा है कि भारत ईरान से अपने संबंधों पर पुनर्विचार करें। इसका कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान के प्रति आक्रामक नीति है, जिस कारण उन्होंने 2015 में राष्ट्रपति ओबामा द्वारा पांच अन्य देशों- चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान से परमाणु समझौता किया था, जिसके अंतर्गत ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करेगा तथा बारह वर्ष से चले आ रहे अमेरिकी प्रतिबंध क्रमश: हटा लिए जाएंगे। ट्रम्प ने अपने चुनाव में वचन दिया था कि वे इस समझौते को रद्द करेंगे और पांच देशों की असहमति के बावजूद उन्होंने ऐसा कर भी दिया जिसके कारण नवम्बर 2018 से ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लागू हो जाएंगे।
भारत ने दृढ़तापूर्वक ईरान से अपने परम्परागत सभ्यतामूलक संबंधों को दोहराया। पर सम्पूर्ण विश्व का आर्थिक-व्यवहार डालर केंद्रित है। यदि अमेरिका ईरान से हर आर्थिक संबंध को रोकता है तो क्या भारत के लिए अपना आर्थिक व्यवहार जारी रखना संभव होगा? सामरिक दृष्टि से ईरान भारत का महत्वपूर्ण सामरिक देश है। वह भारत को तेल आपूर्ति करने वाला तीसरा बड़ा देश है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के खतरे के सामने मुंबई व गुजरात को 7200 किलोमीटर लम्बे उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से जोडऩे का मार्ग ईरान के चाबहार, बंदर अब्बास होते हुए अजरबैजान तथा रूस के सेंट पीटर्स बर्ग तक पहुंचता है जो भारत के लिए इतना जरूरी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस ओर विशेष ध्यान दिया है।
ईरान शिया देश है और भारत में शियाओं की जनसंख्या ईरान के बाद सबसे ज्यादा है। भारत-ईरान प्राचीन संबंध एक अलग पक्ष है। इसलिए भारत अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए अपने हितों से समझौता क्यों करे और क्यों अपनी स्वतंत्र नीति अमेरिकी दबाव में बदले? नरेंद्र मोदी ने अफगानी राष्ट्रपति की उपस्थिति में चाबहार बंदरगाह के विकास हेतु समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस पर भारत साढ़े आठ करोड़ अमेरिकी डालर खर्च कर चुका है और ईरान से अफगान सीमा पर रेल मार्ग भी बना रहा है। कई मुद्दों पर मत भिन्नता भी है, लेकिन आज भी सामरिक रिश्ते उन सब पर भारी पड़ते ही हैं। ऐसे ही प्रगाढ़ और विश्वसनीय संबंध रूस के साथ हैं। आज भी रूस भारत को सैन्य सामग्री की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश है। 68 प्रतिशत भारतीय सैन्य आवश्यकताएं रूस पूरी करता है। अमेरिका 14 प्रतिशत व इजरायल 7.2 प्रतिशत का क्रम बहुत बाद में आता है। क्या भारत अमेरिकी प्रतिबंधों की धमकी के कारण रूस से अपने दशकों पुराने रिश्तों में खटास आने देगा? सत्य यह है कि भारत-अमेरिका के बीच आपसी व्यापार 115 अरब डालर का है। तब भी अमेरिका कभी रूस की तरह भारत का भरोसेमंद मित्र नहीं रहा। फिर भी वर्तमान भू राजनीतिक समीकरणों में भारत-अमेरिका-जापान-आस्ट्रेलिया का सामरिक चीन के समक्ष एक अविजेय ध्रुव बनाता है। इसलिए ट्रम्प की सनक भरी उतार-चढ़ाव वाली विदेश नीति के बावजूद भारत को एक संवदेनशील शक्ति संतुलन बनाने की जरूरत होगी। अगर भारतीय दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिका को पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने चाहिए, जो वैश्विक आतंक का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है। लेकिन निकी हैले पाकिस्तान पर महज शाब्दिक बयानबाजी का कड़ापन पर्याप्त समझती है- जिसका यथार्थ में कोई महत्व नहीं है। भारत की विदेश नीति भारत को ही तय करनी होगी, अमेरिका को उसका कोई अधिकार नहीं। यह हमारा विषय है कि हम अपने मित्र और सहयोगी तय करें। मोदी की विदेश नीति का सफल पक्ष यह है कि इजरायल, सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों के साथ जिनका कोई परस्पर मैत्री संबंध नहीं- बल्कि प्रबल शत्रुताएं हैं- भारत के अच्छे संबंध हैं।
जो नीति भारत-हित साधे वही नीति हमारे राजनयिक संबंधों की कसौटी है। अमेरिका, अमेरिकी हितों के लिए काम करें, लेकिन अमेरिकी हितों के लिए भारत कभी अपनी विदेश नीति में बदलाव नहीं लाएगा- यह निश्चित है। ट्रम्प और निकी हैले को भारत के मित्र चुनने का कोई अधिकार नहीं है। आने वाले छह महीने विदेश नीति की दृढ़ता की परीक्षा के होंगे। हमें अमेरिकी पाखंड को भी समझना होगा, तभी भविष्य बेहतर होगा।

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