लोकपाल की नियुक्ति आसान नहीं

राजेश कश्यप

लोकपाल की नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से बड़ी सख्ती के साथ पूछा है कि लोकपाल की नियुक्ति के मामले में इतनी देरी क्यों हो रही है? न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति आर. भानुमति की पीठ ने केन्द्र सरकार को लोकपाल की नियुक्ति की समय सीमा तय करके दस दिन के अन्दर सूचित करने का आदेश जारी किया है। इस मामले में अगली सुनवाई 17 अप्रैल को सुनिश्चित की गई है। साढ़े चार वर्ष पूर्व अन्ना हजारे के राष्ट्रव्यापी आन्दोलन एवं संघर्ष के उपरांत बहुप्रतिक्षित एवं बहुचर्चित ‘लोकपाल बिल’ संसद में पास हो पाया था। वर्ष 1968, 1969, 1971, 1975, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005 और 2008 में संसद में पेश होने वाला लोकपाल बिल एक लंबे सफर के उपरांत 17 दिसम्बर, 2013 को राज्य सभा में 15 संशोधनों के साथ ध्वनिमत से पारित हो गया और इसके बाद इसे जनवरी, 2013 में लोक सभा में भी ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई।
लोकपाल बिल अमल में आने के लिए महज एक कदम दूर है। राष्ट्रपति की मुहर लगने की औपचारिकता पूरी होते ही यह लागू हो जायेगा। लोकपाल बिल लगभग 50 साल बाद अपने मूल अंजाम तक पहुंचा है। इसके लिए सडक़ से लेकर संसद तक भारी संघर्ष हो चुका है। वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे और उनकी टीम ने वर्ष 2011 में तेरह दिन का ऐतिहासिक आमरण अनशन करके केन्द्र सरकार को नाकों चने चबवा दिए थे। अन्ना हजारे का यह आमरण अनशन भारतीय इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा। लोकपाल बिल के समर्थन में आम आदमी सडक़ों पर सैलाब बनकर उतर आया था और अन्ना के अनशन को ‘आजादी की दूसरी जंग’ की संज्ञा तक दे दी गई थी। सरकार की तरफ से लोकपाल बिल के प्रति इतनी तेजी पहली बार दिखाई दी।
यदि इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो देश की राजनीति में नैतिक मूल्यों का क्षरण बड़ी तेजी से हुआ और नैतिकता का स्तर निरन्तर गिरता चला गया एवं भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से बढ़ता चला गया। राजनीति में नैतिकता के गिरते स्तर और भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल जैसी संस्था की आवश्यकता महसूस हुई। वर्ष 1960 में स्वर्गीय के.एम. मुंशी ने लोकसभा में लोकपाल की नियुक्ति की मांग उठाई। लेकिन इस सन्दर्भ में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। 1962 में चीन का युद्ध होने के कारण देश में आपातकालीन स्थिति घोषित कर दी गई। वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का स्वर्गवास हो गया और सन् 1965 में भारत-पाक युद्ध छिड़ गया। उन्हीं दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का अकस्मात निधन हो गया। अत: लोकपाल जैसे मुद्दे पर सोच विचार करने की स्थिति ही नहीं बनीं। वर्ष 1962 में नियुक्त प्रशासनिक आयोग ने इस विषय में 14 अक्टूबर, 1966 को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। इन्दिरा गांधी की सरकार ने वैश्विक स्तर पर मूल्यांकन के उपरांत लोकपाल बिल तैयार किया। ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक’ सर्वप्रथम 9 मई, 1969 को चौथी लोकसभा में तत्कालीन गृहमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण ने पेश किया। लेकिन, संसद में यह बिल निरस्त हो गया। इसके बाद 1971 और 1977 में भी बिल ठण्डे बस्ते में चला गया। तब 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने लोकपाल बिल को नए रुप में संसद में पेश किया। तत्कालीन कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने इसे संसद के पटल पर रखा। लेकिन कुछ मुद्दों पर विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया और सरकार बिल वापस लेने के लिए मजबूर हो गई। बिल की स्थिति पुन: वैसी की वैसी ही हो गई। इसके बाद राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने ‘लोकपाल बिल-1988’ के नाम से यह बिल 1989 में लोकसभा में पेश किया। लेकिन बिल पास नहीं हो पाया। जनवरी, 1990 में यह बिल लोकसभा में पारित कर दिया गया। लेकिन, बदकिस्मती से इस बिल को राज्यसभा में पेश करने से पूर्व ही राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार गिर गई और यह बिल फिर से रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। इसी प्रकार वर्ष 1996 में एच.डी. देवगौड़ा की सरकार, 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार, 2004 से 2014 तक रही मनमोहन सिंह की सरकार भी लोकपाल को संसद में पेश कर पास नहीं करवा पाई।
बता दें कि 4 अगस्त, 2011 को लोकसभा में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री वी. नारायणसामी ने चालीस पन्नों का लोकपाल विधेयक पेश किया। 8 अगस्त को राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने इस विधेयक को कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन को सौंप दिया। इस तरह साढ़े चार दशकों तक खिंचते-खिंचते ‘लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक’ अत्यन्त पेचीदा होता चला गया। चूंकि अब लोकपाल नियुक्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपना लिया है तो लोकपाल की नियुक्ति अपने अंजाम तक पहुंचने की संभावनाएं मजबूत दिखाई दे रही हैं।

Pin It