जिद… सच की, प्राइमरी शिक्षा, छात्र और लापरवाह तंत्र

सवाल यह है कि इस सबके के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या इसी तरह सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकेगी? क्या बिना किताबों के ही नौनिहालों को शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाएगा? क्या शिक्षा के लचर तंत्र में सुधार करने में सरकार नाकाम हो चुकी है? क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है?

संजय शर्मा

तमाम कवायदों के बावजूद प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आती नहीं दिख रही है। स्कूल खुलने के बाद भी अधिकांश प्राइमरी स्कूलों के छात्रों को यूनिफार्म और किताबें नहीं उपलब्ध कराई गई हैं। लिहाजा स्कूल के पहले दिन ही छात्रों ने बिना पुस्तकों के पढ़ाई शुरू की। यह स्थिति तब है जब सरकार ने प्राइमरी शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का संकल्प लिया है। सवाल यह है कि इन सबके के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या इसी तरह सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकेगी? क्या बिना किताबों के ही नौनिहालों को शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाएगा? क्या शिक्षा के लचर तंत्र में सुधार करने में सरकार नाकाम हो चुकी है? क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है?
प्रदेश सरकार ने जोर-शोर से शिक्षा व्यवस्था में सुधार का बीड़ा उठाया था। बच्चों को इंग्लिश मीडियम से शिक्षा देने के लिए 5000 स्कूल खोले गए। शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने पर जोर दिया गया। बावजूद स्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ। अधिकांश प्राइमरी स्कूलों की हालत बेहद खस्ता है। कई स्कूलों की इमारतें बेहद खराब हैं और यहां कभी भी हादसा हो सकता है। बच्चों को पढऩे के लिए पुस्तकें नहीं हैं। सरकार ने प्राइमरी स्कूलों के बच्चों को यूनिफार्म और जूता-मोजा देने का भी प्रावधान किया है लेकिन स्कूल खुलने के बाद भी बच्चों को न तो यूनिफार्म मिली न ही किताबें उपलब्ध कराई गईं। सारी व्यवस्था लालफीताशाही की चपेट में आकर ध्वस्त हो गई। अधिकांश स्कूलों में बच्चों ने पुरानी किताबों से पढ़ाई शुरू की। खानापूर्ति के लिए एक-आध स्कूलों में यूनिफार्म, किताब और स्कूल बैग बच्चों को मिल सके हैं। हकीकत यह है कि बेसिक शिक्षा विभाग महज 38 फीसदी ही किताबें छपवा सका है। इंग्लिश मीडियम के छात्रों को कोई किताब नहीं मिल सकी है। लापरवाही का आलम यह है कि इंग्लिश मीडियम के छात्रों को हिंदी मीडियम की किताबें बांट दी गईं। जूते-मोजे के टेंडर का विवाद कोर्ट में होने की वजह से उसकी अभी तक आपूर्ति भी शुरू नहीं हो सकी है। साफ है कि यह लापरवाही शिक्षा विभाग की ओर से की गई है। हैरत यह है कि जब हर बार स्कूलों के खुलने का एक निश्चित समय होता है तो विभाग ने इसके लिए पहले से तैयारी क्यों नहीं की? यदि सरकार वाकई शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता लाना चाहती है तो उसे कुछ कड़े और ठोस कदम उठाने होंगे। सरकार को इस मामले में संबंधित विभाग की न केवल जवाबदेही तय करनी चाहिए बल्कि ऐसी लापरवाही करने वालों को चिंहित कर कड़ी कार्रवाई भी करनी चाहिए। बच्चे देश का भविष्य होते हैं और उनके भविष्य से खिलवाड़ करने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती है।

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