जिद… सच की, एक जिला, एक उत्पाद नीति और उम्मीदें

क्या परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति अन्य योजनाओं की तरह लालफीताशाही का शिकार नहीं होगी? क्या सरकार की योजना को जमीन पर उतारने के लिए ईमानदारी से प्रयास किया जाएगा? क्या योजना समिट तक सीमित रह जाएगी? क्या योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार ने कोई ठोस योजना बनाई है?

संजय शर्मा 

एक जिला, एक उत्पाद नीति के तहत यूपी के सभी जिलों के परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कवायद तेज कर दी है। योजना को जमीन पर उतारने के लिए राज्य स्तरीय समिट के आयोजन की तैयारी की जा रही है। समिट में परंपरागत उत्पादों के वैश्विक ब्रांडिंग की योजना बनायी जानी है। परंपरागत उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए अफसरों को गांव-गांव भेजा जा रहा है। इन सारी कवायदों के बीच कुछ सवाल अभी भी अनुत्तरित है। क्या परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति अन्य योजनाओं की भांति लालफीताशाही का शिकार नहीं होगी? क्या सरकार की योजना को जमीन पर उतारने के लिए ईमानदारी से प्रयास किया जाएगा? क्या योजना समिट तक सीमित रह जाएगी? क्या योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार ने कोई ठोस योजना बनाई है? क्या पारंपरिक उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार लेगी? क्या रोजगार सृजन व प्रदेश के आर्थिक विकास पर इसका असर पड़ेगा?
युवाओं के पलायन को रोकने के लिए योगी सरकार ने एक जिला, एक उत्पाद की नीति शुरू की है। इसके तहत जिला स्तर पर रोजगार के साधनों को विकसित करने के लिए परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना है। मसलन लखनऊ की एंब्रायडरी (कढ़ाई), बाराबंकी का दुपट्टा, सीतापुर की दरी, पीलभीत की बांसुरी को पहचान दिलाने का फैसला किया गया है। हर जिले से एक खास उत्पाद का चयन किया गया है। कारीगरों और उद्यमियों को आर्थिक मदद भी मुहैया कराने की व्यवस्था की गई है। सरकार उत्पादों की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर का बनाने के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग भी देगी लेकिन असली सवाल अपनी जगह है। किसी भी उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए बाजार की उपलब्धता जरूरी है। इसके लिए अभी तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई है। दूसरे तमाम कल्याणकारी योजनाएं लालफीताशाही के चलते दम तोड़ चुकी है। ऐसी स्थिति में कारीगरों और उद्यमियों को आर्थिक मदद मुहैया कराना सरकार के सबसे बड़ी चुनौती होगी। उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण व तकनीकी ही पर्याप्त नहीं बल्कि कच्चा माल भी उम्दा और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो वैश्विक स्तर पर उत्पादों को बेचना मुश्किल होगा। इसके अलावा सरकार को परंपरागत उद्यमियों के पीछे मजबूती से तब तक खड़ा रहना होगा जब तक वे मार्केटिंग के तमाम जटिल गुर नहीं सीख जाते हैं वरना वे पहले ही झटके में धराशायी हो जाएंगे। इन सवालों के बावजूद सरकार की नीति प्रशंसनीय है। उम्मीद है सरकार अपनी मंशा में कामयाब होगी। इस कामयाबी से प्रदेश में न केवल बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन होगा बल्कि प्रदेश भी समृद्ध होगा।

Pin It