जिद… सच की, रुपया हुआ बेहाल महंगाई के आसार

अहम सवाल यह है कि डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहे रुपये की वजह क्या है? क्या इस गिरावट का बाजार और महंगाई पर असर पड़ेगा? क्या चीन और अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार का असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है? क्या कच्चे तेल के बढ़ते दामों ने रुपये की सेहत बिगाड़ दी है? क्या आने वाले दिनों में महंगाई की मार झेल रहे लोगों की मुसीबतें और बढ़ेंगी?

संजय शर्मा 

डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार बेहाल होता जा रहा है। दो दिन पहले रुपये में रिकार्ड गिरावट दर्ज की गई। यह डॉलर के मुकाबले 69 रुपये तक पहुंच गया था। फिलहाल रुपये ने मजबूती दर्ज की है और यह 68.61 तक पहुंच गया है। बावजूद इसके डॉलर के मुकाबले रुपये की हालत पतली है। अहम सवाल यह है कि डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहे रुपये की वजह क्या है? क्या इस गिरावट का बाजार और महंगाई पर असर पड़ेगा? क्या चीन और अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार का असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है? क्या कच्चे तेल के बढ़ते दामों ने रुपये की सेहत बिगाड़ दी है? क्या आने वाले दिनों में महंगाई की मार झेल रहे लोगों की मुसीबतें और बढ़ेंगी? क्या तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास की रफ्तार पर ब्रेक लग जाएंगे?
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की सेहत अंतरराष्टï्रीय मुद्रा डॉलर से तुलना करने के बाद पता चलती है। एशियाई देशों में मुद्रा की गिरावट बहुत कुछ कच्चे तेल के दामों व अंतरराष्टï्रीय व्यापार पर निर्भर करता है। कच्चे तेल के दामों में लगातार इजाफा होने का असर रुपये पर भी पड़ रहा है। कच्चे तेल का दाम 76 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। लीबिया और कनाडा से तेल आपूर्ति में पहुंच रही बाधा ने भी तेल के दामों इजाफा कर दिया है। रही सही कसर अमेरिका द्वारा ईरान से कच्चे तेल के आयात पर प्रतिबंध लगाने से निकल गई है। बैंक और निर्यातक अमेरिकन करेंसी नहीं बेच रहे हैं। इसका असर भारतीय मुद्रा पर पड़ रहा है। हालांकि रुपये में कुछ पैसों की मजबूती दिखी, लेकिन यह नाकाफी है। यह मजबूती भी इसलिए दिखी क्योंकि बैंकों और निर्यातकों ने अमेरिकन करेंसी बेची थी। अमेरिका और चीन के बीच हो रहे ट्रेड वॉर ने भी रुपये को प्रभावित किया है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर करों की छूट खत्म कर दी है। रुपए में गिरावट से महंगाई बढ़ सकती है, साथ ही विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को भी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। इन छात्रों को फीस अदा करने के लिए महंगे दर पर डॉलर खरीदना पड़ेगा। देश में साबुन, शैम्पू व पेंट के दाम बढ़ सकते हैं। क्रूड, खाद्य तेल और फर्टिलाइजर भी महंगे हो जाएंगे। जूलरी सेक्टर पर भी इसका नाकारात्मक असर पड़ेगा। तेल के दाम बढऩे का असर खाद्य पदार्थों पर भी पड़ेगा। तमाम विकास योजनाओं की रफ्तार कम हो जाएगी और अर्थव्यवस्था की विकास दर को गति देना मुश्किल हो जाएगा। शेयर बाजार भी धड़ाम हो सकते हैं। जाहिर है भारतीय मुद्रा को रोकने के लिए केंद्रीय बैंक को कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे वरना इस गिरावट को रोकना मुश्किल हो सकता है। हालांकि बेहतर मानसून भी कुछ राहत देगा।

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