जिद… सच की, अन्नदाताओं को आश्वासन और जमीनी हकीकत

संजय शर्मा

अहम सवाल यह है कि किसानों के हित में चलाई जा रही तमाम योजनाएं आज भी जमीन पर पूरी तरह क्यों नहीं उतर पा रही हैं? वे आज भी अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी केंद्रों का चक्कर काटने के लिए मजबूर क्यों हैं? क्या कर्ज माफी से किसानों की समस्याएं तनिक भी कम हुई हैं? उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी उनका भला क्यों नहीं कर पा रहा है? बिचौलियों से आज भी किसानों को छुटकारा क्यों नहीं मिल पा रहा है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर करने का आश्वासन दिया है। अन्नदाताओं से संवाद स्थापित करते हुए पीएम ने साफ किया कि केंद्र सरकार 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का प्रयास करेगी। इसके लिए सरकार क्या-क्या कदम उठा रही है इसका भी हवाला दिया गया। यह सही है कि बजट में कृषि पर विशेष फोकस किया गया। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में किसानों की कर्ज माफी की गई। बावजूद इसके कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। अहम सवाल यह है कि किसानों के हित में चलाई जा रही तमाम योजनाएं आज भी जमीन पर पूरी तरह क्यों नहीं उतर पा रही हैं? वे आज भी अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी केंद्रों का चक्कर काटने के लिए मजबूर क्यों हैं? क्या कर्ज माफी से किसानों की समस्याएं तनिक भी कम हुई हैं? उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी उनका भला क्यों नहीं कर पा रहा है? बिचौलियों से आज भी किसानों को छुटकारा क्यों नहीं मिल पा रहा है? वे आज भी लालफीताशाही का शिकार क्यों हो रहे हैं? अंत में किसान आत्महत्या को मजबूर क्यों हो रहे है?
भारत कृषि प्रधान देश है। देश की जीडीपी में किसानों की भागीदारी काफी अधिक हैं। आजादी के सात दशक से अधिक बीत जाने के बावजूद किसानों की माली हालत में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। तमाम सरकारें आईं और गईं लेकिन किसान को उपज का सही दाम नहीं मिल सका। फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तक अर्थशास्त्र के नियमों के मुताबिक तय नहीं किया जा रहा है। किसानों से बातचीत किए बिना सरकार समर्थन मूल्य तय कर देती है। इससे उसे फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। सरकारी क्रय केंद्रों में वह भ्रष्टïाचार का शिकार हो रहा है। कई बार किसान क्रय केंद्रों पर एक पखवाड़े तक डेरा डाले रहता है लेकिन उसकी फसल नहीं खरीदी जाती है। यहां से मायूस होकर वह अपनी फसल निकट की मंडी में औने-पौने दाम में बेचने पर मजबूर होता है। यह सारा खेल अफसरों और बिचौलियों की मिलीभगत से किया जाता है। योजनाओं का लाभ भी उसे नहीं मिल पा रहा है। बैंक से लेकर सरकारी दफ्तर तक किसानों से इतने दस्तावेज मांगते हैं कि वह इनका लाभ नहीं लेने में ही भलाई समझता है। कर्जमाफी की योजना भी लालफीताशाही का शिकार हो गई। यदि सरकार किसानों का भला चाहती है तो उसे फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य बाजार मूल्यों के उतार-चढ़ाव के आधार पर तय करना होगा। बिचौलियों को समाप्त करना होगा और लालफीताशाही के पेंच कसने होंगे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो किसानों के प्रति सरकार की मंशा चाहे जितनी अच्छी हो वह फलीभूत नहीं हो सकेगी।

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