रेपो रेट बढ़ाये जाने के मायने

डॉ अश्विनी महाजन

अधिकतर अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की अपेक्षाओं को गलत साबित करते हुए मौद्रिक नीति कमेटी ने 6 जून, 2018 को लगभग साढ़े चार साल के बाद ‘रेपो रेट’ में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए उसे 6.25 प्रतिशत कर दिया। हालांकि दो साल पहले तक रेपो रेट के बारे में निर्णय रिजर्व बैंक गवर्नर ही किया करते थे। अभी यह निर्णय रिजर्व बैंक गवर्नर की अध्यक्षता में छह सदस्यों वाली मौद्रिक नीति कमेटी करती है। अब तक इस कमेटी ने कभी भी ‘रेपो रेट’ बढ़ाने की सिफारिश नहीं की थी।
जब से यह कमेटी बनी और उससे पहले भी देश में महंगाई की दर काफी थमी हुई थी। साल 2012-13 के आस-पास महंगाई की दर 10 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच गयी थी। इसलिए रिजर्व बैंक ने कई बार रेपो रेट बढ़ाया और वर्ष 2014 तक आते-आते रेपो रेट 8.00 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
इसके कारण उधार लेना लगातार महंगा होता जा रहा था। इससे निवेश तो प्रभावित हो ही रहा था, ईएमआई बढऩे के कारण घरों की मांग भी घटने लगी और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की भी। लेकिन हाल ही में तेल की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई हालिया वृद्धि ने महंगाई की दर को बढ़ा दिया है और अप्रैल माह में महंगाई की दर 4.6 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी।
गौरतलब है कि पिछले काफी समय से उपभोक्ता महंगाई की दर 2.5 प्रतिशत से 3.5 प्रतिशत के बीच चल रही थी। घटती महंगाई से उत्साहित होकर पहले रिजर्व बैंक गवर्नर और बाद में मौद्रिक नीति कमेटी ने बारंबार रेपो रेट में कमी की और यह जनवरी 2014 में 8.0 प्रतिशत से घटती हुई मार्च 2018 तक 6.00 प्रतिशत तक पहुंच गयी। घटती ब्याज दरों के कारण अर्थव्यवस्था में निवेश और घरों की मांग में बेहतरी हुई और साथ ही अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में भी। नयी-नयी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं भी फलीभूत होने लगीं और जीडीपी ग्रोथ 2017-18 की आखिरी तिमाही में 7.7 प्रतिशत तक पहुंच गयी। अरसे से रिजर्व बैंक और मौद्रिक नीति कमेटी रेपो रेट के निर्धारण में बहुत हद तक महंगाई की वर्तमान दर और रिजर्व बैंक की भविष्य में महंगाई दर की अपेक्षाओं पर ज्यादा निर्भर रही है।
उसका कारण यह है कि रिजर्व बैंक का मानना है कि वास्तविक ब्याज दर को धनात्मक रखना जरूरी है, इसलिए जब भी महंगाई बढ़ेगी, रेपो रेट बढ़ाना जरूरी हो जायेगा। रिजर्व बैंक का यह भी मानना है कि अगर ब्याज दर नहीं बढ़ायी जायेगी, तो विदेशी निवेशकों का धन भी बाहर जा सकता है, जिससे रुपया कमजोर हो सकता है। ब्याज दर ऊंचा रखने से महंगाई दर को भी नियंत्रण में रखा जा सकता है।
रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक, रिजर्व बैंक से उधार लेते हैं। इसके विपरीत रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर है, जो रिजर्व बैंक में बैंकों द्वारा जमा राशि पर मिलती है। यानी यदि रेपो रेट बढ़ता है, तो उधार लेनेवाले बैंकों की भी लागत बढ़ जाती है। इसलिए उद्योग और व्यवसायी चाहते हैं कि रेपो रेट कम हो जाये, ताकि उन्हें सस्ती दर पर बैंकों से ऋण मिल सके। रेपो रेट कम होने पर गृहस्थों को भी लाभ होता है, क्योंकि उनके उधारों पर भी ब्याज लागत कम हो जाती है और ईएमआई घट जाती है। व्यवसाय ही नहीं, इफ्रास्ट्रक्चर का भी विकास ब्याज दर घटने से होता है। चूंकि महंगाई दर में भविष्य में अचानक कोई वृद्धि होगी, ऐसी आशंका नहीं है। क्योंकि कृषि वस्तुओं की अच्छी उपलब्धता बाजार में है और कृषि वस्तुओं की कीमतें ठीक हालत में हैं। सरकार आयात शुल्क भी बढ़ा रही है। जीडीपी ग्रोथ में वृद्धि भी भविष्य में महंगाई घटने की ओर इंगित कर रही है। ऐसे में रिजर्व बैंक ने कहा कि उसका भविष्य के प्रति कोई नकारात्मक रुख नहीं है और उसने अपना तटस्थ रुख रखा है। नोटबंदी और जीएसटी के कारण हुई उथल-पुथल के बाद पहली बार अर्थव्यवस्था में उठाव के लक्षण दिखायी दे रहे हैं और जीडीपी ग्रोथ 6.6 प्रतिशत की धीमी गति से बाहर आती हुई 7.7 प्रतिशत पहुंच गयी है। भारत सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि एक लंबे समय के बाद अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों जैसे मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और कृषि में भी खासी तेज ग्रोथ हो रही है। इसलिए महंगाई बढऩे की आशंका के कारण ब्याज दरों में वृद्धि उचित नीति नहीं है।
हालांकि, बाजारों ने भी रिजर्व बैंक के तटस्थ रुख के चलते कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है और शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि रेपो रेट बढऩे के बावजूद भी ‘सेंसेक्स’ 6 जून, 2018 को 275 अंक और 7 जून को भी 284 अंक बढ़ गया। आशा की जा सकती है कि रिजर्व बैंक का तटस्थ रुख जल्द ही आशावादी रुख में बदलेगा और बढ़ी हुई रेपो रेट घटने की ओर अग्रसर होगी।

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