ब्रिटिश सेना ने भारत को दी थी ऑपरेशन ब्लूस्टार की सलाह

कुलदीप नैय्यर

भारत में ऐसी दुखद घटनाओं की भरमार है जिन्हें दोबारा याद करने पर यही लगेगा कि उन्हें टाला जा सकता था। ऑपरेशन ब्लूस्टार इन्हीं में से एक है। उग्रवादी जरनैल सिंह भिंडरवाले सिखों के शीर्ष स्थान अकाल तख्त में छिप गया था और राज्य के भीतर एक राज्य बना लिया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसकी बंदूकों को शांत करने के लिए सेना भेज दी और हरमंदिर साहेब में टैंक भेज दिया। कोई कुछ भी कहे, सिखों के दिल में भिंडरवाले के लिए इज्जत बरकरार है। मुझे एक बार इसका अंदाजा हो चुका है जब, अनजाने में, मैंने उसका नाम एक आतंकवादी के रूप में लिया था। सिख इतिहासकार खुशवंत सिंह भिंडरवाले को आतंकवादी बताकर भी बच निकले। लेकिन मैं नहीं बच पाया। मेरी आलोचना की गई कि मैंने सिखों का अपमान किया।
बेशक, प्रधानंत्री इंदिरा गांधी अकालियों को खत्म करना चाहती थीं और भिंडरवाले को चुनौती देने से उन्हें यह मौका मिल गया। इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी, भतीजे अरुण नेहरू और राजीव गांधी के सलाहकार अरुण सिंह उस फैसले के पीछे थे जिसने इंदिरा गांधी को उग्रपंथी नेता और उसके सहयोगियों को निकालने के लिए सेना भेजने के लिए मजबूर किया। धवन के इस कथन का उल्लेख है कि राजीव, अरूण नेहरू तथा अरूण सिंह का मानना था कि एक सफल सैन्य कार्रवाई उन्हें आसानी से चुनाव जिता सकती है।
ऑपरेशन ब्लूस्टार इंदिरा गांधी का महज अंतिम युद्ध नहीं था, शायद राजीव गांधी की पहली और शायद सबसे विनाशकारी गलती थी। उस गलती की भरपाई के लिए राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह मंदिर जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें रोका गया। उन्होंने एक गैर-सरकारी विमान लिया और माफी मांगने के लिए मंदिर गये। उन्हें गहरी चोट तो तब लगी जब उन्हें आल इंडिया रेडियो पर ऑपरेशन का बचाव करने के लिए कहा गया। बाद में, उन्होंने मुझसे कहा कि उन्होंने मना करना चाहा, लेकिन उन्हें लगा कि इससे देश में संकट पैदा हो जाएगा कि राष्ट्रपति एक लाइन ले रहे हैं और सरकार दूसरी। वह आकाशवाणी पर आए और उन्होंने ऑपरेशन का बचाव किया। राष्ट्र को संबोधित करते समय वह सचमुच रो पड़े।
स्वर्ण मंदिर की तस्वीरें देखकर इंदिरा गांधी भी सदमे में थीं। तस्वीरें अरुण सिंह लाये थे। अरुण ने बताया कि उनकी फूफी (इंदिरा गांधी) अंतिम क्षण तक ऑपरेशन क्रियान्वित करने के लिए राजी नहीं थीं। लेकिन सेना प्रमुख तथा ऑपरेशन ब्लूस्टार कराने वाली तिकड़ी ने आखिरकार उनका मन बदल दिया। यह मुख्य तौर पर इसलिए हुआ कि राजीव गांधी ने पंजाब मामलों को सीधे देखना शुरू किया था जो कुछ समय पहले तक उनके भाई संजय गांधी देखते थे। यह अलग बात है कि गांधी को स्वर्ण मंदिर के हमले की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी जब उनके सुरक्षा गार्डों ने ही गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। राजीव गांधी मां की हत्या के बाद भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश (544 में 421 सीटें जीतकर) सत्ता में आए। मैं उस टीम का सदस्य था जो जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, एयर मार्शल अर्जन सिंह तथा इंदर गुजराल को लेकर इस बात की पड़ताल के लिए बनी थी कि एक ओर, अकाली तथा सरकार और दूसरी ओर, सिखों और हिंदुओं के बीच कितनी दूरी है। हमारा निष्कर्ष यही था कि ऑपरेशन जरूरी नहीं था और भिंडरवाले से और तरीकों से निपटा जा सकता था। यह हमने पंजाबी ग्रुप को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा जिसने हमें इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए हिंदु-सिख दंगों की जांच की जिम्मेदारी सौंपी थी। आज स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश के 34 वर्ष बाद ब्रिटिश दस्तावेजों के सार्वजनिक हुए दस्तावेज दिखाते हैं कि सिखों के ऐतिहासिक स्थान को फिर से कब्जे में लेने के लिए ब्रिटिश सेना ने भारत को सलाह दी थी। इसने लंदन तथा नई दिल्ली दोनों जगह राजनीतिक तूफान पैदा कर दिया है। ब्रिटिश सरकार ने इन खुलासों की जांच का आदेश दे दिया है और भाजपा में इस बारे में उत्तर की मांग की है।
यह खुलासा ब्रिटेन में राष्ट्रीय अभिलेखागार की और 30 साल तक गोपनीयता पालन करने के नियम के तहत सार्वजनिक किए गए पत्रों की श्रृंखला से होता है। एक सरकारी पत्र-व्यवहार, जिसकी तारीख 23 फरवरी, 1984 है और जिसका शीर्षक ‘सिख समुदाय’ है, में विदेश मंत्री के एक कर्मचारी ने गृह मंत्रालय के निजी सचिव से कहा है कि विदेश मंत्री उस पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी देना चाहते हैं जिससे देश के सिख समुदाय के बीच परिणाम होने की संभावना हो सकती है। उसने पत्र में आगे कहा है कि अगर ब्रिटेन की सलाह सार्वजनिक होती है तो इससे भारतीय समुदाय में तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, इस बारे में कोई पत्र व्यवहार नहीं दिखाई देता है कि ब्रिटिश योजना का जून 1984 के ऑपरेशन में इस्तेमाल हुआ। जब मैं 1990 में ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त था, तो मैंने पाया कि दूतावास में सिख समुदाय के प्रवेश को लेकर एक पूर्वाग्रह था और मेरे शुरू के कुछ कदमों में एक यह था कि सभी के लिए दरवाजे खोल दिए जाएं। उच्चायोग में प्रवेश के लिए सिर्फ सिखों की जो तलाशी होती थी वह बंद कर दी गई।

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