महाराणा के शौर्य से राष्ट्रवाद की प्रेरणा

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

इतिहास केवल अतीत की जानकारी देने के लिए नहीं है। बल्कि इसके गौरवशाली प्रसंगों से भावी पीढ़ी को प्रेरणा लेनी चाहिए। इस संदर्भ में इतिहास का सही लेखन भी अपरिहार्य होता है। राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले महान होते हैं। महाराणा प्रताप ने यदि अपने और अपने परिवार को सुविधाओं को वरीयता दी होती तो वह भी राजसिंहासन पर बने रह सकते थे। इसके लिए उन्हें अकबर के द्वारा प्रेषित आधिपत्य प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ता।

अकबर को राजस्व का अंश देना पड़ता, इसके बदले में राणा प्रताप अपने महल में सुख सुविधा के साथ रहते। पराधीनता का एक तमगा ही तो लगना था। अनेक भारतीय राजा यह प्रस्ताव स्वीकार कर चुके थे। लेकिन महाराणा प्रताप भी ऐसा करते तो आज उन्हें राष्ट्रनायक के रूप में याद नहीं किया जाता। उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए उन्होंने निजी हित बलिदान कर दिए। महलों की सुविधा और वैभव छोड़ कर जंगल मे घास की रोटी खाने पसन्द किया। लेकिन आक्रांताओं की गुलामी मंजूर नहीं की। इसीलिए वह महान थे। भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा की विभूति बन गए। अकबर और राणा प्रताप एक साथ महान नहीं हो सकते। दोनों विपरीत ध्रुव पर थे। दोनों के बीच संघर्ष था। अकबर गुलाम बना रहा था, राणा प्रताप स्वतंत्र रहना चाहते थे। इतना ही नहीं चरित्र के स्तर पर भी महाराणा प्रताप और अकबर विपरीत ध्रुवों पर थे। राणा प्रताप केवल हिन्दू ही नहीं मुस्लिम महिलाओं का भी सम्मान करते थे। जबकि अकबर का हरम चर्चा में रहता था। राणा प्रताप स्वधर्म और राष्ट्रवाद के प्रतीक थे। इसलिए भारत के राष्ट्रीय सन्दर्भ में महाराणा प्रताप को ही महान कहे जाएंगे। प्रेरणा उन्हीं से लेनी होगी। उनके स्वाभिमान से सीखना होगा। वह वनवासियों को साथ लेकर युद्ध करते हैं, इस भाव को समझना होगा। उन्हीं के सहयोग से अपने राज्य को प्राप्त करते हैं। शौर्य ऐसा कि अकबर भी सामने आने का कभी साहस नहीं कर सका।

हल्दीघाटी युद्ध अनिर्णायक रहा किन्तु तय हुआ कि अकबर में प्रताप का भय था उसने महाराणा प्रताप से युद्ध के लिए भी राजपूत मानसिंह और अपने बेटे को भेजा था। वह जानता था कि राणा प्रताप के सामने आने से उसकी महाबली वाली छवि बिगड़ जाएगी। हल्दीघाटी के बाद भी राणा का संघर्ष जारी रहा। वह सेना सहित युद्ध स्थल से हटकर पहाड़ी प्रदेश में आ गए थे। बाद के कुछ वर्षों में अपने राज्य पर फिर अधिकार कर लिया था। सन् पन्द्रह सौ सत्तानबे में चावंड में उनकी मृत्यु हो गई थी। जीते जी उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

राजपूत राजाओं में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्होंने अकबर की मैत्रीपूर्ण दासता को ठुकरा दिया था। अंग्रेज तो भारत के लोंगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने की नीति पर चल रहे थे। वह नहीं चाहते थे कि भारत के महान सेनानियों से लोग प्रेरणा लें। आजादी के बाद यही कार्य वामपंथी इतिहासकारों ने किया। उन्होंने अकबर को महान घोषित कर दिया । इतिहास की किताबों में उसके नाम के साथ सरनेम की तरह महान जोड़ दिया। यह राणा प्रताप के महत्व को कम करने वाला कार्य था। अकबर को महान बताया तो उससे संघर्ष करने वाले लोग महान नहीं हो सकते। यही कारण था कि महाराणा की दिवेर युद्ध विजय को इतिहास से ही हटा दिया गया दिवेर युद्ध की योजना महाराणा प्रताप ने कालागुमान पंचायत के मनकियावास के जगलों में बनाई थी। हल्दीघाटी युद्ध के बाद राणा प्रताप अरावली के घने जगलों एवं गुफाओं में रहने लगे थे। यही भामाशाह ने उन्हें पच्चीस हजार सैनिकों के बारह वर्ष तक निर्वाह कर पाने लायक मुद्रा भेंट की थी। इतिहास को भी सही लिखने की आवश्यकता है। महाराणा प्रताप के शौर्य से प्रेरणा आज भी प्रासंगिक है। इसके माध्यम से राष्ट्र को मजबूत बनाया जा सकता है। इस प्रेरणा के साथ अनेक प्रसंग भी जुड़े है। यहां तक कि नकारात्मक प्रसंगों से भी सबक लिया जा सकता है। कल्पना करिए कि जब एक महाराणा ही अकबर की परेशानी का कारण बन गए, एक शिवा जी ने चौबीस वर्षों तक औरंगजेब को चैन से बैठने नहीं दिया। ऐसे में यदि भारतीय राजाओं ने एकजुटता दिखाई होती तो विदेशी अक्रांता यहां से पराजित होकर ही जाते। मतलब भारत अपने लोगों के मतभेद और स्वार्थ के कारण सदियों तक गुलाम रहा।

आज भी ऐसे अनेकों तत्व समाज में मौजूद हैं। जो आतंकवादियों की भी पैरिवी करते हैं। इसके अलावा अंग्रेजों ने साजिश के तहत भारतीयों को बांटने का कार्य किया। राणा प्रताप को समाज कब सभी वर्गों ने समर्थन व सहयोग दिया था। इनमें भामाशाह जैसे व्यापारी और वनवासी तक सभी शामिल थे। तमाम मतभेद के बाद भी हमारा समाज एक था। ये सभी तत्व आज भी प्रासंगिक हैं।

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