गठबंधन का घेरा तोडऩे की रणनीति बनाने में जुटी भाजपा तैयार कर रही छोटे दलों से तालमेल का मसौदा

  • सहयोगियों में शामिल किए जा सकते हैं कुछ अन्य दल
  • कुछ दलों के क्षेत्रीय प्रभाव का आकलन कर रहे हैं भाजपा के दिग्गज
  • जातीय समीकरण साधने के लिए पार्टी चला रही है अभियान

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता का सामना करने के लिए भाजपा ने अभी से कमर कसनी शुरू कर दी है। गठबंधन का घेरा तोडऩे के लिए भाजपा रणनीति बदलने की तैयारी में है। सहयोगी दलों को मनाने के अलावा भाजपा के दिग्गज अन्य छोटे दलों पर भी नजर बनाए हुए हैं। इन छोटे दलों के साथ किस तरह से तालमेल बनाया जाए इस पर चिंतन-मनन की प्रक्रिया जारी है। इसके अलावा भाजपा जातीय समीकरण साधने की कोशिश कर रही है। विशेषकर दलितों पर उसका फोकस है।

भाजपा सभी वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अभियान चला रही है ताकि वह जातीय समीकरणों को साध सके। दलित वोट बैंक पर उसकी खास नजर है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को दलित वोट मिले थे। फिलहाल कई छोटे दल भी भाजपा से मिलकर चुनाव लडऩे के लिए कतार में हैं।

राजनीति में आए ताजा बदलावों को देखते हुए भाजपा ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पिछला रिकार्ड दोहराने के लिए भाजपा जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के साथ गठबंधन की संभावनाओं को भी टटोल रही है। विपक्षी एकता को देखते हुए भाजपा ने छोटे दलों के साथ गठबंधन का मसौदा तैयार करना शुरू कर दिया है। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा ने रिकार्ड जीत दर्ज की थी। इस बार भी भाजपा यूपी में पिछला रिकार्ड बरकरार रखने की तैयारी में है। हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि कुछ और छोटे दलों से भी आने वाले चुनाव में तालमेल हो सकता है। गौरतलब है कि यूपी में योगी सरकार बनने के बाद से भाजपा लोकसभा की तीन और विधानसभा की एक सीट हार चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से रिक्त हुई गोरखपुर और फूलपुर सीट बहुजन समाज पार्टी के समर्थन से समाजवादी पार्टी ने जीत ली। दूसरी ओर कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में सपा और राष्ट्रीय लोकदल ने गठजोड़ कर भाजपा को शिकस्त दी है। इन सीटों पर कांग्रेस, बसपा और आम आदमी पार्टी का भी समर्थन रालोद और सपा उम्मीदवार को था। संपूर्ण विपक्ष के अघोषित गठबंधन ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। विपक्षी एकता के इन रिश्तों की इस मजबूती ने भाजपा को नये सिरे से अपनी ताकत बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। भाजपा ने सभी वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अभियान चला रही है ताकि वह जातीय समीकरणों को साध सके। दलित वोट बैंक पर उसकी खास नजर है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को दलित वोट मिले थे। फिलहाल कई छोटे दल भी भाजपा से मिलकर चुनाव लडऩे के लिए कतार में हैं। भाजपा इनके प्रभाव का आकलन कर रही है। माना जा रहा है कि इनमें से एक-दो को गठबंधन में मौका मिल सकता है।

क्या है समीकरण

पिछले विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उप्र में प्रभावी महान दल ने 14 सीटों पर लडक़र 0.11 प्रतिशत मत हासिल किया था। इसके अलावा 81 सीटों पर लड़े लोकदल को 0.21 प्रतिशत मत मिले थे। लोकदल के अध्यक्ष सुनील सिंह ने कैराना और नूरपुर के उपचुनाव में भाजपा पर हमलावर होने के बजाय सपा और राष्ट्रीय लोकदल पर निशाना साधा था। ऐसे कई और दल हैं जिन्हें विधानसभा चुनाव में जीत भले न मिली हो लेकिन उनको मिले मतों से राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते दिखे। पिछली बार 0.18 प्रतिशत मत पाने वाली बहुजन मुक्ति पार्टी, .04 प्रतिशत मत पाने वाली भारतीय शक्ति चेतना पार्टी और .08 प्रतिशत मत पाने वाली भारतीय सुभाष सेना इसकी बानगी है। इनकी वजह से मतों का बिखराव हुआ। कभी बसपा की ताकत समझे जाने वाले बाबू सिंह कुशवाहा के समर्थक 2017 के विधानसभा चुनाव में जनाधिकार मंच और जन अधिकार पार्टी के जरिये लामबंद हुए थे। दोनों को करीब 0.16 प्रतिशत मत मिले थे। पिछली बार तो 302 छोटे दल मैदान में थे। इनमें कुछ अपने-अपने इलाकों में हार-जीत की वजह बनने के लिए पर्याप्त हैं।

ये हैं सहयोगी दल

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल से तालमेल किया था जबकि 2017 के विधानसभा में अपना दल एस के साथ ही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ भी गठबंधन किया। अपना दल को नौ और सुभासपा को चार सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा कुर्मी मतों के साथ ही राजभर और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों को प्रभावित करने में कामयाब रही। इस प्रयोग को आने वाले चुनाव में विस्तार मिल सकता है।

 

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