अधिकारों से बेदखल आदिवासी

मोहन गुरुस्वामी

तेलंगाना स्थित पूर्ववर्ती आदिलाबाद जिले के निवासी गोंड एवं अन्य आदिवासियों के प्रतिनिधि संगठन तथा तेलंगाना सरकार के बीच चल रही बातचीत इस सप्ताह विफल हो जाने के बाद आदिवासी नेताओं ने घोषणा कर दी कि अब वे अपने गांवों में ‘स्वशासन’ कायम करने की अपनी पूर्व घोषणा पर अमल करेंगे। ऐसा कर वे झारखंड के आदिवासियों द्वारा पहले से ही चलाये जा रहे ऐसे अभियान का ही अनुसरण कर रहे हैं।
झारखंड में मुंडा आदिवासियों ने राज्य सरकार की कथित ‘आदिवासी-विरोधी’ नीति के विरोधस्वरूप राज्य के पांच जिलों के लगभग 300 गांवों में ‘पत्थलगड़ी’ कार्यक्रम के अंतर्गत बड़े शिलाखंड खड़े कर उन पर संविधान की पांचवीं अनुसूची में वर्णित आदिवासियों के अधिकारों की घोषणा कर रखी है, जिसके अनुसार उनकी ग्रामसभा ही उनका सर्वोच्च शासी निकाय है। इन गांवों में राज्य सरकार के कर्मियों का आना प्रतिबंधित है और अमूमन ऐसे मामलों में जैसा हुआ करता है, सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था की समस्या मान इसकी वास्तविक वजहों से आंखें मूंद ली हैं। तेलंगाना के इस क्षेत्र में गैर-आदिवासियों के प्रवासन की कहानी लंबी है। वर्ष 1945 में ही हैदराबाद की तत्कालीन निजाम सरकार ने राज्य में आदिवासियों की स्थिति का अध्ययन कराया, जिससे यह पता चला कि किस तरह इस क्षेत्र के आदिवासी गांवों में भी बाहरी लोगों ने अधिकतर कृषि भूमि पर स्वामित्व हासिल कर रखा है। यही वर्तमान सच्चाई भी है, जब आदिवासी बचे-खुचे जंगलों में और अंदर ठेल दिये गये अथवा छोटे-मोटे पेशों तक सीमित कर दिये गये हैं, जबकि उनकी जमीन बाहर से आकर बसनेवालों ने हथिया ली है। तेलंगाना के गोंड आदिवासियों ने तब ‘आदिवासी’ होने की अपनी वह विशिष्ट स्थिति भी खो दी, जब वहां बसते जा रहे घुमंतू चरवाहों के समुदाय ‘बंजारों’ को 1977 में अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया। इस दर्जे ने उन्हें गोंड आदिवासियों की जमीनें हासिल करने की कानूनी अर्हता प्रदान करने के अलावा सुरक्षित सियासी सीटों, शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश के साथ ही गोंडों को हासिल अन्य लाभों का भी अधिकारी बना दिया। चूंकि पड़ोसी महाराष्ट्र में बंजारों को यह दर्जा हासिल न था, इसलिए वहां से भी बड़ी संख्या में बंजारों ने अवसरों की तलाश में इस राज्य का रुख कर लिया। इस नयी स्थिति ने इस क्षेत्र के पुराने आदिवासियों का और अधिक अलगाव कर डाला। वर्तमान में तेलंगाना की विधानसभा में बंजारों का खासा प्रतिनिधित्व होने के अतिरिक्त अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित सरकारी नौकरियों पर भी उनका अच्छा आधिपत्य है।
आज भारत की 8.2 प्रतिशत आबादी जनजातीय है और वे भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में फैले हैं। इन्हें तीन मोटी श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में वैसी आबादी आती है, जिसे बहुत-से नृतत्ववेत्ता ऑस्ट्रो-एशियाई-भाषी ऑस्ट्रेलॉयड जन की संज्ञा देते हैं। ये भारत में द्रविड़ों, आर्यों अथवा किसी भी अन्य आगंतुकों के पहले से मौजूद रहे हैं। मध्य भारत के ‘आदिवासी’ इसी श्रेणी में आते हैं. जनजातीय लोगों की अन्य दो श्रेणियां कॉकेसॉयड तथा चीनी-तिब्बती अथवा मंगोलॉयड जनजातियों की है, जो जो बाद में आये और हिमालयी एवं पूर्वोत्तर क्षेत्रों में बसे हैं। स्पष्ट है कि सभी अनुसूचित जनजातियां ‘आदिवासी’ नहीं हैं।
स्वतंत्र भारत में आदिवासियों के विपरीत, बाकी दो श्रेणियों की जनजातियों का अधिक विकास हुआ। उनमें भी राजस्थान के मीना एवं गूजर तथा मेघालय की खासी जनजातियां तो इतनी लाभान्वित हुईं कि इस पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या वे अब भी अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित लाभों की हकदार बने रहने योग्य हैं? इसलिए आज यदि तेलंगाना के गोंड आदिवासी असंतोष एवं आक्रोश के शिकार हैं, तो उसकी वाजिब वजहें हैं। उनकी मांग है कि न सिर्फ बंजारा आबादी की जनजातीय मान्यता समाप्त की जाये, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में पदस्थापित इस आबादी से आये सभी सरकारी कर्मियों को वहां से वापस बुलाया जाये, क्योंकि वे उन्हें अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों का अपहर्ता तथा अपना शोषक मानते हैं।
यह सर्वविदित है कि एक संवेदनशील प्रणाली के अभाव में बड़ी सरकारें भी बौनी बन जाती हैं और विकास की तलहटी में स्थित लोगों की उसके साथ जो भी थोड़ी-बहुत अंतक्र्रिया संभव है, वह सुखद नहीं होती। अधिकतर आदिवासी बसावटों की स्कूलों या स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है, उनमें से बहुत कम ही बारहों मास सडक़ सुविधा से जुड़ी हैं और उनकी वन्य संपदा पहले ही लूटी जा चुकी है।
संविधान के अनुच्छेद 244 के अंतर्गत पांचवीं एवं छठी अनुसूचियां विशिष्ट जनजातीय बहुल क्षेत्रों में स्वशासन के प्रावधान करती हैं, जबकि पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों में रहनेवाले आदिवासियों की जमीन तथा प्राकृतिक संसाधनों को गैर आदिवासियों द्वारा हस्तगत किये जाने से सुरक्षा प्रदान करती है।
इन राज्यों के राज्यपालों को इन क्षेत्रों के लिए विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिनके इस्तेमाल कर वे आदिवासियों के अनुचित शोषण से उनकी रक्षा के प्रभावी कानूनी प्रावधान कर सकते हैं। पर सभी राज्यपाल अपने इन विशिष्ट दायित्वों के निर्वहन में निरपवाद रूप से विफल ही रहे हैं।

Pin It