मरीजों का दर्द बढ़ा रहीं सरकारी अस्पतालों की खस्ताहाल मशीनें, रेडिएशन का भी मंडरा रहा खतरा

  • जांच के दौरान आए दिन खराब हो रही हैं मशीनें प्राइवेट सेंटरों के चक्कर काट रहे हैं मरीज
  • हाथ पर हाथ धरे बैठा है अस्पताल प्रशासन, कई बार जांच कराने से रेडिएशन से प्रभावित हो रहे मरीज

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। सरकारी अस्पतालों में खस्ताहाल जांच मशीनें मरीजों का दर्द बढ़ा रही हैं। जांच के दौरान आए दिन मशीनें खराब हो रही हैं, लिहाजा सिटी स्कैन से लेकर एक्स-रे तक कराने के लिए मरीजों को प्राइवेट सेंटरों का चक्कर काटना पड़ता है। सबसे अधिक परेशानी गरीब मरीजों को हो रही है। जांच के दौरान मशीन के खराब होने से उन्हें एक ही जांच कई बार करानी पड़ती है, जिससे उनके मशीन से निकले रेडिएशन से प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। वहीं अस्पताल प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

शासन को भेजा गया है प्रस्ताव

बलरामपुर अस्पताल के निदेशक डॉ. राजीव लोचन और सिविल अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. हिम्मत सिंह दानू का कहना है कि नई सीटी स्कैन मशीन के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है लेकिन अभी तक नई मशीन नहीं मिल सकी है। नई मशीनों के आने पर मरीजों को इस समस्या से छुटकारा मिल सकेगा।

राजधानी के कई नामचीन सरकारी अस्पतालों में जांच मशीनों की हालात बदतर हो चुकी है। आमतौर पर दस साल के बाद अस्पतालों की जांच मशीनें काम करने लायक नहीं रहती है। इनको कंडम की लिस्ट में डाल दिया जाता है। बावजूद इसके राजधानी के सरकारी अस्पतालों में बीस साल पुरानी मशीनों से जांच की जा रही है। केजीएमयू, लोहिया, बलरामपुर और सिविल अस्पताल में पुरानी हो चुकी सीटी स्कैन मशीनें मरीजों का दर्द बढ़ा रही हैं। जांच का बोझ बढऩे ये मशीनें अक्सर खराब हो जाती हैं। पुरानी एक्सरे मशीनों का भी यही हाल है। लिहाजा मरीजों को जांच कराने के लिए इधर से उधर दौडऩा पड़ता है। अस्पतालों में लगाई गई एक्सरे मशीनें भी जर्जर हो चुकी है। केजीएमयू, लोहिया और बलरामपुर अस्पताल में कई बार सीटी स्कैन खराब हो चुकी है। वही लोहिया की एमआरआई मशीन भी खराब पड़ी है। एमआरआई मशीन ठीक नहीं होने के कारण मरीजों को जांच के लिए इधर से उधर भटकना पड़ रहा है। इन सभी अस्पतालों में हर दिन सौ से डेढ़ सौ मरीजों को सीटी स्कैन जांच लिखी जाती है जबकि पचास से साठ मरीज एमआरआई के लिए आते हैं। जर्जर मशीनों के कारण मरीजों को एक ही जांच कई बार करानी पड़ जाती है। इसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़ता है। इन मशीनों से निकलने वाले रेडिएशन से मरीजों को खतरा रहता है। रेडियोलाजिस्टों के मुताबिक पुरानी हो चुकी सीटी स्कैन मशीनों से रेडिएशन का खतरा बहुत ज्यादा होता है। इससे रेडियोलाजिस्टों के साथ मरीजों को भी कई तरह की बीमारियां होने का संभावना होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक नई मशीनों से इसका खतरा नहीं होता है क्योंकि नई मशीनों में मल्टी स्लाइस लगी होती है जोकि रेडिएशन को रोकने में कारगर है जबकि पुरानी मशीनों में सिंगल स्लाइस ही लगी है।
जाहिर है यदि इन सरकार अस्पतालों में मशीनों को जल्द नहीं बदला गया तो जांच के लिए आने वाले मरीजों की सेहत खतरे में पड़ सकती है। दूसरी ओर मरीजों की इन समस्याओं को लेकर अस्पताल प्रशासन कतई गंभीर नहीं दिख रहा है। वह व्यवस्था सुधारने के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति कर रहा है। अस्पताल प्रशासन की इस उदासीनता का सबसे अधिक खामियाजा गरीब मरीजों को उठाना पड़ रहा है। वे निजी पैथालॉजी सेंटरों में महंगी जांच कराने में सक्षम नहीं है। लिहाजा जांच के लिए तमाम मरीज इन अस्पतालों के चक्कर लगाने पर मजबूर हैं।

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