राहुल की ‘घर-बाहर’ दोनों जगह कड़ी परीक्षा

अजय कुमार

कैराना और नूरपुर उप-चुनाव के नतीजे आने के साथ ही अब सभी दलों के नेताओं की नजर 2019 के आम चुनाव पर टिक गई हैं। यह तो तय है कि लोकसभा चुनाव के समय उत्तर प्रदेश एक बार फिर चर्चा में रहेगा। संभावना इस बात की है कि अगला प्रधानमंत्री एक बार फिर यूपी से ही होगा। पीएम की दौड़ में वाराणसी के सांसद नरेन्द्र मोदी तो हैं ही इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष व अमेठी के सांसद राहुल गांधी को भी कांग्रेस द्वारा भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रमोट किया जा रहा है। इन दो नेताओं के अलावा सपा-बसपा प्रमुख अखिलेश-मायावती भले ही खुलकर कुछ नहीं कर रहे हों लेकिन यह दोनों नेता भी अपने-अपने मन में पीएम बनने की इच्छा पाले हुए हैं।

इस कड़ी में सपा के संरक्षक मुलायम सिंह का नाम भी उस समय जुड़ गया, जब अखिलेश ने एक सवाल के जबाव में नेताजी को प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार बताया था। लेकिन यह भी तय है कि जोड़-तोड़ के सहारे सपा की पीएम की कुर्सी के लिये दावेदारी मजबूत होगी तो अखिलेश अपना ही नाम आगे बढ़ायेंगे। मौका मिलने पर अखिलेश-माया पीएम की दौड़ में भले शामिल हो जायें, लेकिन इस बात की संभावना काफी कम है कि यह दोनों नेता चुनाव भी लड़ेगें। हां, पीएम मोदी का वाराणसी से और राहुल गांधी का अमेठी से चुनाव लडऩा तय माना जा रहा है।

यदि सोनिया गांधी रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ेंगी तो राहुल अमेठी की जगह रायबरेली से मैदान मेें कूद सकते हैं, इसकी वजह है बीजेपी की दिग्गज नेत्री और मोदी कैबिनेट में मंत्री स्मृति ईरानी। वह अमेठी से पिछला चुनाव भले ही हार गई थीं,लेकिन उन्होंने राहुल गांधी को यूपी की अमेठी संसदीय सीट से दोबारा चुनाव जीतने की संभावनाओं पर सवाल उठाने वाले मीडिया कर्मियों से दो टूक कह दिया कि 2019 में इस सीट पर भाजपा की जीत तय है। अगले साल अप्रैल-मई में 17वीं लोकसभा का चुनाव होना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को जबर्दस्त टक्कर दी थी, इसी के चलते हमेशा बड़े अंतर से जीतने वाले राहुल गांधी की जीत का अंतर मात्र एक लाख वोटों तक सिमट गया था। इसके बाद स्मृति ने यहां पिछले चार वर्षों में काफी मेहनत की और यह मान कर चला जा रहा है कि अमेठी में स्मृति ही 2019 में राहुल गांधी को टक्कर देंगी। राहुल के लिए जीत आसान नहीं होगी। बहरहाल, अमेठी का राजनैतिक इतिहास खंगाला जाये तो पिछले करीब तीन दशक से गांधी परिवार और अमेठी एक-दूसरे के पूरक से बने हैं। 1980 में पहली बार इस संसदीय सीट से संजय गांधी ने जीत हासिल की थी। संजय गांधी की असमायिक मौत के बाद राजीव गांधी, फिर सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी इस सीट से लोकसभा से सांसद हैं। जब गांधी परिवार का कोई व्यक्ति यहां से चुनाव नहीं लड़ा तो उनके करीबी कैप्टन सतीश शर्मा ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। 1998 को छोडक़र अब तक सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही यहां से चुनाव जीतती आई है। 1998 में बीजेपी से चुनाव जीतने वाले संजय सिंह भी आज कांग्रेस पार्टी के ही प्रमुख नेता हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में बल्कि अमेठी में भी गांधी परिवार की चमक कुछ धूमिल होती दिख रही है। जबकि बीजेपी नेत्री और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जड़ें अमेठी में मजबूत हुई हैं। विधानसभा चुनाव के समय यहां के मतदाताओं ने कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया था। इसकी शुरुआत 2012 के विधानसभा चुनावों से हुई थी, जब केंद्र की सत्ता में रहने हुए भी कांग्रेस यहां से सिर्फ दो विधान सभा सीटें जीत सकी थी। इस घटना के बाद एक जीते हुए विधायक ने पार्टी छोड़ दी। जहां तक 2017 के विधानसभा चुनाव की बात है तो कांग्रेस पार्टी यहां की चार में से एक सीट भी नहीं जीत पाई थी।

राहुल ने अमेठी की जनता से वादा किया था कि आप सब देखिएगा, आज से 10-15 साल बाद जहां कैलिफोर्निया का नाम लिया जाता है, सिंगापुर का नाम लिया जाता है, अमेठी का नाम लिया जाएगा। चाहे हमें कितनी ही रोकने की कोशिश की जाए कोई असर नहीं होगा। चाहे ये फूड पार्क छीन लें, आईआईआईटी छीन लें, हिंदुस्तान पेट्रोलियम छीन लें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अमेठी दुनिया का मशहूर एजुकेशन हब बनेगा कोई नहीं रोक सकेगा। लेकिन जनता से किए वादे पूरे नहीं होने के कारण लोगों में गांधी परिवार से प्रति प्रेम और समर्पण में कमी देखी गई है।

राहुल के लिए मजबूरी यह है कि यूपी में कांग्रेस संगठनात्मक रूप से काफी कमजोर है और पिछले कई चुनावों से राहुल गांधी भी यहां कोई चमत्कार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने दो ही विकल्प हैं, पहला यह की कांग्रेस अकेले चुनाव लड़े या फिर उसे महागठबंधन में सपा-बसपा नेताओं के रहम पर रहना होगा।

Pin It