भारत की आर्थिक भविष्य-नीति

 अजीत रानाडे

एक माह से कुछ ही ज्यादा हुए, जब प्रधानमंत्री मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दो दिनों की अनौपचारिक बैठक के लिए वुहान गये थे। ऐसा समझा जाता है कि यह बैठक चीनी राष्ट्रपति के आमंत्रण पर आयोजित हुई। जैसा शी ने मोदी को बताया भी कि पिछले पांच वर्षों के अपने कार्यकाल में किसी विदेशी अतिथि से मिलने वे सिर्फ दो ही बार बीजिंग से बाहर गये और दोनों ही बार यह आगंतुक मोदी ही थे। कुछ शंकालु टिप्पणीकारों ने वुहान की उपलब्धियों पर सवाल भी खड़े किये, हालांकि उन्होंने अफगानिस्तान में भारत-चीन द्वारा संयुक्त परियोजनाओं के अलावा दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच सीधे संवाद जैसी वुहान की अहम घोषणाएं उपेक्षित कर दीं। डोकलाम की तनातनी के बाद वुहान की इस यात्रा ने दोनों देशों की आपसी संबंध सुधारने की इच्छा के संकेत दिये।

इसी माह चिंग्दाऊ में होनेवाली शंघाई सहयोग कॉरपोरेशन की बहुपक्षीय बैठक में भी मोदी द्वारा सहभागी बनने की आशा की जाती है, जो प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी पांचवीं चीन यात्रा होगी। मोदी ऐसे भी पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने वुहान एवं चिंग्दाऊ के मध्य में सिंगापुर में आयोजित ‘शंग्री-ला संवाद’ जैसे सुरक्षा से संबद्ध एक विशिष्ट शीर्ष सम्मेलन में भाग लिया, जिसे भारत-प्रशांत क्षेत्र में संघर्ष, जोखिम एवं सुरक्षा से संबद्ध मुद्दों पर विमर्श हेतु आयोजित किया जाता है।

यहां कई वक्ताओं ने इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती हठधर्मिता की चर्चा की और नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने सुसंतुलित संवाद में इन मुद्दों पर सहमति जताते हुए भी चीन के साथ सकारात्मक सहभागिता की अहमियत पर बल दिया। इस सम्मेलन में व्यक्त मोदी की इस उक्ति ने भी खासी प्रसिद्धि पायी कि ‘जब भारत तथा चीन भरोसे और विश्वास से साथ मिलकर एक-दूसरे के हितों के प्रति संवेदनशीलता से कार्य करेंगे, तो एशिया और विश्व का भविष्य बेहतर बनेगा।’ दूसरी ओर उन्होंने अबाधित एवं शांतिपूर्ण वाणिज्य हेतु सामुद्रिक मार्गों की स्वतंत्र सुलभता का जिक्र करते हुए विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर भी जोर दिया। चीन की ओर संकेत करते हुए उन्होंने राष्ट्रों को अपनी जनता पर अवहनीय ऋण बोझ डालने के प्रति सचेत किया। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी ने अतार्किक संरक्षणवाद पर प्रकारांतर से अमेरिकी नीतियों की ओर भी संकेत किया। स्पष्ट है कि मोदी की ये उक्तियां विश्व की दो मौजूदा महाशक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के साथ ही भारत की ‘लुक ईस्ट’ तथा ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के अनुरूप भी थीं। आसियान क्षेत्र के साथ भारत की निकट सहभागिता राष्ट्रीय हितों का पोषण ही करेगी, मगर इसका अर्थ यह भी नहीं कि भारत क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझीदारी जैसे आसियान प्रायोजित समूह की वैसी नीतियों का भी अंध समर्थन करे, जिनका इस्तेमाल हमारे उद्योगों के लिए विनाशकारी प्रभाव की कीमत पर सिर्फ हमारे विशाल बाजारों का लाभ उठाने के लिए किया जाये।

इस संदर्भ में चीन के साथ व्यापार, वाणिज्य तथा निवेश के क्षेत्र में हमारी ज्यादा सहभागिता भारत के हितों की पोषक है। चीन के साथ हमारे बड़े व्यापार घाटे की भरपाई भारत के बुनियादी ढांचे में उसके द्वारा अधिक निवेश से की जा सकती है। भारत को चीन के बड़े और बढ़ते घरेलू बाजार का भी फायदा उठाना ही चाहिए। चीन अपनी विकास रणनीति की समीक्षा कर निर्यात, उद्योगों तथा निवेशों की उन्मुखता की बजाय क्रमश: घरेलू उपभोग, सेवाओं और उपभोक्ता वस्तुओं पर गौर करने के द्वारा उसे सप्रयास संतुलित कर रहा है। अपने इतिहास में पहली बार वह नवंबर में एक आयात एक्सपो आयोजित कर वैश्विक निर्यातकों को अपने यहां उपलब्ध अवसरों से परिचित करानेवाला है, जिसमें भारतीय उद्योगों को भी सक्रियतापूर्वक भाग लेना चाहिए। भारत के उद्यमियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर होगा। हमें और अधिक चीनी सैलानियों को आकृष्ट करना चाहिए, क्योंकि उससे भी चीनी व्यापार घाटा कम हो सकेगा।

यह सच है कि चीन के साथ अधिक सहभागिता का यह अर्थ तो कदापि नहीं कि हम अमेरिका एवं यूरोप के अपने परंपरागत व्यापारिक बाजारों की अनदेखी कर दें। भारत के सभी व्यापारिक साझीदारों में अमेरिका के साथ हमारा सर्वाधिक व्यापार अधिशेष (सरप्लस) रहता है। अमेरिका में मौजूद अनुकूल कर तथा स्पर्धा स्थितियों की वजह से बहुत-सी भारतीय कंपनियां वहां उत्साहपूर्वक निवेश करती आयी हैं। इक्कीसवीं सदी एशिया के नाम होनेवाली है और चीन एवं भारत इसकी दो सर्वाधिक बड़ी अर्थव्यवस्थाएं होने जा रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में विभिन्न राष्ट्रों का हिस्सा अंतत: उनकी आबादी के हिस्से की बराबरी करने जा रहा है। चीन अपनी उस नियति की राह पर आगे बढ़ चुका है और भारत को भी उसी पथ का पथिक बनना है। पर, इस बीच हमें विश्व की इन दो सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों से सृजनात्मक, कल्पनात्मक, यथार्थवादी और लाभदायक रूप से समान दूरी बरकरार रखते हुए भी एक ही साथ क्षेत्रीय तथा वैश्विक बहुपक्षवाद को मजबूत करने में लगे रहना चाहिए।

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