सवाल दुनिया को बदलने का है

रविभूषण

मई 2018 में दुनिया की पूरी आबादी सात अरब 62 करोड़ और संयुक्त राष्ट्र के एक आंकलन के अनुसार 31 मई, 2018 को भारत की आबादी 1 अरब, 35 करोड़, 27 लाख, 13 हजार, 973 थी। यानी भारत की मौजूदा आबादी दुनिया की कुल आबादी का 17.74 प्रतिशत है। भारत सहित पूरी दुनिया में अरबपतियों-खरबपतियों की संख्या बढ़ रही है। अमेजन कंपनी के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी जेफ वेजो की पूंजी कुछ समय पहले एक ही दिन में एक अरब डॉलर से अधिक बढ़ गयी थी. ऑक्सफेम के अनुसार, दुनिया के आठ सबसे बड़े अरबपतियों के पास पचास प्रतिशत गरीबों की कुल संपत्ति है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में भारत में एक ओर जहां अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर असमानता भी बढ़ रही है।

रूसी क्रांति की शतवार्षिकी, नक्सलबाड़ी आंदोलन की अर्धशतवार्षिकी और ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ के प्रकाशन की 170वीं वर्षगांठ के बाद माक्र्स की द्विशतवार्षिकी आरंभ हो चुकी है। सोवियत संघ की विफलता को माक्र्सवाद की विफलता समझनेवाले यह नहीं जानते कि यह विफलता ‘माक्र्सवादी सिद्धांत के एक खास व्यवहार की विफलता’ है। माक्र्सवाद को अप्रासंगिक घोषित करनेवाले और भारत को ‘माक्र्सवाद मुक्त भारत’ बनानेवालों को न तो अपने समय की पहचान है और न पूंजी के वर्तमान रूप और संकट की। माक्र्सवाद को ‘विदेशी विचारधारा’ बतानेवालों के गले में पूंजीवाद की तख्ती लगी हुई है। तीस वर्ष की उम्र में माक्र्स ने एंगेल्स के साथ कम्युनिस्ट घोषणापत्र की रचना की थी। इस घोषणापत्र में उन्होंने यह लिखा था कि पूंजीपति वर्ग ने डॉक्टर, वकील, पुरोहित, कवि, वैज्ञानिक-सबको वेतन देकर उजड़ता मजदूर बना दिया है और पारिवारिक संबंधों पर छाये भावुकता के पर्दे को फाडक़र फेंक दिया है। उसने इस संबंध को भी महज मुद्रा के संबंध में बदल दिया है। 1848 में ही उन्होंने पूरब को पश्चिम पर आश्रित बनाने की बात कही थी। माक्र्स का लिखित साहित्य और माक्र्स पर लिखित साहित्य का व्यापक समग्र, गंभीर अध्ययन निरंतर जारी है। उन्हें पढऩे और समझने के भी कई तरीके हैं।

अर्नस्ट फिशर की पुस्तक हाउ टू रीड कार्ल माक्र्स ऐसी ही पुस्तक है। साल 2008 के वैश्विक पूंजी संकट के बाद माक्र्स और अधिक पढ़े जाने लगे। वे 21वीं सदी में और प्रासंगिक हो गये। आज जिन कॉरपोरेटों ने भारत सहित दुनिया पर कब्जा कर रखा है, उनकी पहचान माक्र्स ने कर ली थी। दास कैपिटल में उन्होंने यह बताया था कि कुछ कॉरपोरेट संपूर्ण उत्पादन को नियंत्रित करते हैं। आज सरकारें कॉरपोरेटों के साथ आलिंगनबद्ध हैं। यह सच है कि दुनिया के मजदूरों के बजाय कॉरपोरेट एक हो गये हैं, पर कोई भी स्थिति सदैव कायम नहीं रहती। पूंजीवाद के सभी रूपों- व्यापारी, खेतिहर, औद्योगिक, इजारेदार, महाजनी आदि पर माक्र्स ने विचार किया है और ‘पॉलिटिकल इकोनॉमी’ के साथ ‘कैपिटल’ के तीसरे खंड में उन्होंने ‘कल्पित’ और ‘फर्जी’ (फिकटिशॅस) पंूजी की बात कही है। यह पूंजी ‘वास्तविक पंूजी’ की विरोधी है। माक्र्स ने इसका जन्म क्रेडिट सिस्टम में और विकास ज्वॉयंट स्टॉक सिस्टम के विकास में देखा था। स्टॉक मार्केट में कंपनियों द्वारा स्टॉक, शेयर और फंड का व्यापार भी इसी श्रेणी में है।

समुदाय को विचार केंद्र में रखने वाले ‘सबाल्टर्न इतिहासकारों’ और विगत तीन-चार दशकों में अस्मिता-विमर्श के सिद्धांतकारों और पैरोकारों के यहां ‘वर्ग’ गौण है। नये-नये सिद्धांतकारों और विमर्शकारों ने माक्र्सवाद को मृत और अप्रासंगिक सिद्ध करने के कम प्रयत्न नहीं किये हैं, पर ये सारे प्रयत्न निष्फल रहे हैं। माक्र्स ने जो कुछ भी विद्यमान है, उसकी निर्मम आलोचना की बात कही थी। माक्र्सवाद पर हमला और माक्र्स का चरित्र-हनन कम नहीं है, पर उसके अर्थशास्त्रीय और राजनीतिक चिंतन की सार्थकता-प्रासंगिकता नष्ट नहीं हो सकती।

अंग्रेजों द्वारा हिंदुस्तान पर ढायी गयी मुसीबतों पर माक्र्स ने लिखा था कि आज जरूरत इसकी है कि स्वतंत्र भारत की सामान्य जनता पर जो मुसीबतें खड़ी की गयी हैं, उन पर विचार किया जाये और उनका निदान किया जाये। समस्या पंूजीवाद है और इससे संघर्ष जारी रहे बिना इसकी समाप्ति संभव नहीं है। यूरोपीय माक्र्सवादियों ने वर्ग और वर्ग संघष को महत्व नहीं दिया। भारत में जाति और धर्म से कम प्रमुख वर्ग नहीं है, पर हमने जाति और धर्म पर अधिक ध्यान दिया, वर्ग पर नहीं। माक्र्स की वर्ग संबंधी अवधारणा मानव-मुक्ति के लिए सदैव प्रासंगिक है और वर्ग-संघर्ष का संबंध ‘क्रांतिकारी राजनीति’ से है।

माक्र्सवाद मूल रूप से क्रांति को महत्व देता है। वह क्रांति का विज्ञान है। हमारा समय क्रांति से अधिक भ्रांति का है। गोयबल्स के भारतीय वंशजों की संख्या बढ़ रही है। वे झूठ के जरिये भ्रांति फैलाने में लगे हैं। पहले इस भ्रांति को दूर करना जरूरी है। बर्बर और नृशंस पूंजीवाद और उनके अनुचरों से माक्र्स और माक्र्सवाद ही लड़ सकता है। अब सवाल दुनिया को बदलने का है।

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