योगी के दुलारे अफसर ही उनकी फजीहत कराने में जुटे, थानेदारों की तैनाती को लेकर बेवजह के विवाद लगा रहे सीएम की साख पर धब्बा

  • प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी के अहम की लड़ाई में हो रही है सीएम की फजीहत
  • शासनादेश जारी होने के बाद से आमने-सामने आ गए थे आईएएस और आईपीएस अफसर
  • पूरे देश में विवाद की खूब हुई चर्चा, आईपीएस अफसरों ने दर्ज कराया था विरोध, फिर हुआ संशोधन

 संजय शर्मा
लखनऊ। योगी सरकार के दुलारे अफसर सरकार की तारीफ कराने के काम कराने की जगह आजकल सरकार की फजीहत कराने मे जुटे हैं। थानों में दरोगा की तैनाती को लेकर जो शासनादेश सालों पुराना था उसे फिर जारी करके विवादों को जन्म दिया जा रहा है। आईएएस और आईपीएस के बीच इस तरह के विवादों की चर्चा अब यूपी में ही नहीं हो रही बल्कि पूरे देश में हो रही है। लोग समझ नही पा रहे कि यह बड़े अफसर यहां सीएम की साख बढ़ाने को तैनात किये गये या साख खराब करने को। प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी के बीच अहम की इस लड़ाई में अगर किसी की सबसे ज्यादा फजीहत हो रही है तो वह खुद सीएम की। लोग सवाल कर रहे है कि आखिर हर दो महीने पर एक नया विवाद पैदा क्यों किया जा रहा है?

दरअसल, पुलिस एक्ट में पहले से निर्देशित है कि जिलों के थानों में थानेदार की तैनाती डीएम से पूछकर की जायेगी। कुछ जिलों में यह परंपरा चल रही थी कुछ में नहीं भी पर कोई विवाद सामने नहीं आया था। मगर अचानक बिना किसी कारण के गृह विभाग ने पत्र जारी किया कि जिलों में क्राइम मीटिंग डीएम की अध्यक्षता में होगी। इस पत्र से आईपीएस अफसर भडक़ गये। सूबे में आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन ने बाकायदा सोशल मीडिया पर भी इसकी चर्चा शुरू कर दी। अपने-अपने पक्ष में एक दूसरे के ऊपर आरोप और प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया। सीएम की नाराजगी के बाद यह मामला थमा पर तब तक देश भर में इसकी चर्चा शुरू हो गयी थी।

यह मामला शांत हुआ था कि कुछ समय बाद फिर क्राइम मीटिंग की अध्यक्षता का मुद्दा छोडक़र गृह विभाग का एक और पत्र चर्चा में आ गया जिसमें बिना डीएम की लिखित अनुमति के थानेदार तैनात न किये जाने का जिक्र था। इस खत के बाद नोएडा के एसएसपी ने जब अपनी मर्जी से थानेदार तैनात किये तो डीएम ने न सिर्फ इनकी तैनाती रोकने को कहा बल्कि एसएसपी को कड़ा खत भी लिख दिया जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह विवाद भी बहुत तूल पकड़ गया और फिर अपने-अपने पक्ष में आईएएस और आईपीएस सामने आ गये। इसकी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची। सीएम की भारी नाराजगी के बाद मामला निपटाने के लिये एसएसपी ने डीएम को खत लिखा तब मामला शांत हुआ। मगर पिछले हफ्ते फिर डीएम की लिखित अनुमति के बिना थानेदारों की तैनाती न करने का गृह विभाग ने खत जारी कर दिया और फिर आईएएस और आईपीएस अफसरों में जंग शुरू हो गयी। सूत्रों का कहना है कि इस बार खुद डीजीपी ने इसकी शिकायत सीएम से की। सीएम की नाराजगी के बाद कल यह आदेश वापस करके कहा गया कि लिखित नहीं सिर्फ सहमति लेकर किया जाये तबादला।

दरअसल यह सारा विवाद प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी के बीच चल रहे अहम की लड़ाई का है। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह से तो प्रमुख सचिव गृह के मतभेदों की चर्चा थानेदार स्तर तक होने लगी थी। अब देखना यह है कि यह दोनों अफसर अपने अहम की लड़ाई खत्म करेंगे या सीएम की और फजीहत कराएंगे।

यह एसोसिएशन का मामला नहीं है। आईएएस और आईपीएस दोनों सरकार के अभिन्न अंग हैं और दोनों मिलकर सरकार के लिये काम करते हैं। विवाद की कोई बात नहीं है।

-प्रवीर कुमार , अध्यक्ष, आईएएस एसोसिएशन

दोनों ही संस्थान सरकार के महत्वपूर्ण अंग हैं। नए आदेश से दोनों के संबंध बेहतर होंगे।

-प्रवीण सिंह, अध्यक्ष आईपीएस एसोसिएशन

कुछ दिन पहले जो शासनादेश जारी हुआ था उसमें जिलाधिकारी की संस्तुति की बात कही गई थी। वह बेवजह का आदेश था। प्रमुख सचिव गृह द्वारा जारी किया गया ताजा शासनादेश पूर्व में भी काम करता रहा है। जिले में डीएम और एसपी को हमेशा साथ रहना होता है। जिलाधिकारी के पास अन्य भी तमाम काम होते हैं। बेवजह बात का बतंगड़ बनाना उचित नहीं है। इस फैसले का हम स्वागत करते हैं।

-बृजलाल, अध्यक्ष, अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग व पूर्व डीजीपी

डीएम और एसपी के बीच तबादलों को लेकर केवल विचार-विमर्श होता था। यह प्रक्रिया अंग्रेजों के जमाने से रही है। बीच में नया शासनादेश जारी करके पुलिस विभाग को कमजोर दिखाने का काम किया गया। यह उचित नहीं था। नया शासनादेश स्वागत योग्य है। जिलाधिकारी के पास विकास सहित अन्य तमाम काम होते हैं। उन पर ध्यान देना चाहिए। अपने अधिकारियों को पुलिस कप्तान बेहतर तरीके से समझ सकते हैं जिलाधिकारी नहीं।

-के. एल. गुप्ता, पूर्व डीजीपी, यूपी

बहन जी का बंगला बचाने की गुहार लगाने सीएम के पास पहुंचे सतीश मिश्रा

  • मुख्यमंत्री योगी से मुलाकात के दौरान दिया पूर्व कैबिनेट के निर्णयों का हवाला
  • कहा, निर्णय के मुताबिक किसी दूसरे को अलॉट नहीं किया जा सकता बंगला

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बसपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सरकारी बंगला बचाने की जुगत में लगी हुई हैं। इसी मामले को लेकर बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। श्री मिश्रा ने मुलाकात के दौरान बंगले को लेकर पूर्व में लिए गए कैबिनेट फैसले का हवाला दिया।

सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने 13 माल एवेन्यू कांशीराम यादगार स्थल को लेकर मुख्यमंत्री से मुलाकात की। इस दौरान सीएम को बताया कि यह स्थल कांशीराम की याद में बनवाया गया था। बाद में यह बसपा प्रमुख मायावती को अलॉट हुआ। 13 जनवरी 2011 को कैबिनेट में निर्णय लिया गया था कि पूरा बंगला कांशीराम यादगार स्थल के नाम से रहेगा और मायावती इसके छोटे से भाग में रहेंगी। श्री मिश्रा ने एक दूसरे आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यह भी तय किया गया था कि मायावती के इस आवास को छोडऩे के बाद यह किसी दूसरे के नाम पर अलॉट नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि बंगला न छोडऩे के लिए मायावती ने पहले भी दांव चला था। माना जा रहा है कि वे इस बंगले पर अपना कब्जा बरकरार रखना चाहती हैं। मायावती ने 13-ए मॉल एवेन्यू बंगले पर ‘कांशीराम यादगार विश्राम स्थल’ का बोर्ड लगा दिया है। इससे पहले ‘कांशीराम यादगार विश्राम स्थल’ सरकारी बंगले के बगल वाले हिस्से को बताया जाता था। वहीं दूसरी ओर राज्य संपत्ति विभाग ने इस महीने के आखिर तक यूपी के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने के लिए कहा है। बताया जा रहा है कि बसपा प्रमुख मायावती 13-ए मॉल एवेन्यू के सरकारी बंगले को छोडऩे के बाद पास ही स्थित 9-ए मॉल एवेन्यू में शिफ्ट होंगी। ये बंगला उनका निजी निवास स्थान है।

Pin It