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शहरों की जहरीली होती हवा और सवाल

सवाल यह है कि प्रदेश में प्रदूषण के असली कारण क्या हैं? क्या प्रदूषण नियंत्रण मानकों को दरकिनार कर संचालित किए जा रहे कल कारखाने इस सबके लिए जिम्मेदार हैं? क्या वनों की अंधाधुंध कटाई और सडक़ों पर बढ़ती वाहनों की संख्या प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रही है? क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जहरीली हवा के विस्तार पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो रहा है?

प्रदेश के तमाम शहरों की हवा जहरीली होती जा रही है। वायु प्रदूषण के कारण इन शहरों में मृत्यु दर में तेजी से इजाफा हो रहा है। प्रदूषण से कानपुर में सर्वाधिक मौतें हुई हैं जबकि राजधानी लखनऊ इस मामले में दूसरे नंबर पर है। आगरा, इलाहाबाद, मेरठ, वाराणसी व गोरखपुर की भी हालत खराब है। सवाल यह है कि प्रदेश में प्रदूषण के असली कारण क्या हैं? क्या प्रदूषण नियंत्रण मानकों को दरकिनार कर संचालित किए जा रहे कल कारखाने इस सबके लिए जिम्मेदार हैं? क्या वनों की अंधाधुंध कटाई और सडक़ों पर बढ़ती वाहनों की संख्या प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रही है? क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जहरीली हवा के विस्तार पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो रहा है? क्या बढ़ता प्रदूषण विकास के केंद्र से पर्यावरण को दरकिनार करने का नतीजा है? क्या नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है?

वायु प्रदूषण पर जारी सेंटर फॉर इंवायरनमेंट एंड एनर्जी डिवेलपमेंट (सीड) और आईआईटी दिल्ली की रिपोर्ट बेहद गंभीर है। यह न केवल प्रदेश के पर्यावरण की हकीकत बया कर रही है बल्कि इस मामले में तमाम सरकारी दावों की पोल भी खोल रही है। रिपोर्ट से साफ है कि शहरों में प्रदूषण जानलेवा हो चुका है और इसकी चपेट में आकर लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं। प्रदूषित हवा फेफड़े को खराब कर रही है। बच्चे अस्थमा रोग से ग्रसित हो रहे हैं। इन शहरों में फेफड़ा रोग से ग्रसित मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, जिसके चलते देर-सबेर उनकी मौत हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण कानपुर में 4173 और लखनऊ में 4127 लोगों की मौत प्रति वर्ष हो रही है। शहरों की यह स्थिति एक दिन में नहीं हुई है। विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण को दरकिनार कर दिया गया। वनों की अंधाधुंध कटाई की गई। शहरों में कंक्रीट के जंगल उग गए और हरियाली गायब हो गई। कल-कारखानों से निकलने वाला धुआं वातावरण को लगातार प्रदूषित कर रहा है। तमाम निर्देशों के बावजूद कारखानों में प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। रही सही कसर सडक़ों पर दौड़ रहे असंख्या वाहनों ने निकाल दी है। ये प्रदूषण में लगातार इजाफा कर रहे हैं। कहने को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड है लेकिन यह शो पीस बन चुका है। बोर्ड के अफसर मानकों की जांच के नाम पर खानापूर्ति करते हैं। वहीं सरकार भी इस मामले में कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठा सकी है। प्रदूषण को कम करने के लिए पौधारोपण अभियान भी फेल हो चुका है। यह अभियान अफसरों की लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है। वैसे सरकार हर साल करोड़ों पेड़ लगाने का दावा करती है, लेकिन ये दावे कागजों तक सीमित हो चुके हैं। यदि सरकार ने जल्द ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए तो स्थितियां विस्फोटक हो जाएंगी और प्रदूषण से शहर में मौतों का आंकड़ा और बढ़ जाएगा।

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