वित्त आयोग की शर्तों पर विवाद

डॉ. अश्विनी महाजन

केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय बंटवारे हेतु संवैधानिक व्यवस्था के नाते 15वें वित्त आयोग का गठन हो चुका है। एनके सिंह को उसका अध्यक्ष बनाया गया है। 9वें वित्त आयोग तक वित्त आयोग संविधान में अंकित विभिन्न बंटवारे योग्य करों के केंद्र और राज्यों के बीच बांटने और विभिन्न राज्यों के बीच भी बांटने हेतु सिफारिश देता रहा है।

लेकिन, 9वें वित्त आयोग की सिफारिशों में एक फार्मूले की सिफारिश हुई, जिसके अनुसार सुझाव दिया गया कि कुल केंद्रीय कर राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत राज्यों को दिया जाये। चूंकि एक तरफ राज्यों को इस फार्मूले से फायदा हो रहा था, तो दूसरी तरफ उन्हें यह भी लग रहा था कि कई बार केंद्र सरकार लोकलुभावन नीतियों के चलते ऐसे कई टैक्स नहीं लगाती, जिनको राज्यों के साथ साझा करना पड़ता है, जिससे राज्यों को हानि होती है, इसलिए राज्यों ने इस फॉर्मूले को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसके बाद केंद्र-राज्यों के बीच करों का बंटवारा प्रतिशत आंकड़े के रूप में ही तय होने लगा। 14वें वित्त आयोग ने अचानक केंद्रीय करों में राज्यों के हिस्से को पूर्व में 32 प्रतिशत से बढ़ाकर एकदम 42 प्रतिशत कर दिया था।

राज्य सरकारों को जितना टैक्स एकत्र करने का अधिकार है, उनकी जरूरतें उससे कहीं ज्यादा हैं, इसलिए संविधान में वित्त आयोग की व्यवस्था की गयी है, ताकि राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के राजस्व में से भी कुछ हिस्सा मिले। इसलिए हर पांच साल के बाद राष्ट्रपति द्वारा एक वित्त आयोग का गठन किया जाता है। वित्त आयोग के संदर्भ में कई ऐसी शर्तें हैं, जिनसे राज्य काफी नाराज हैं। 15वें वित्त आयोग में यह संदर्भ डाला गया है कि राजस्व घाटे संबंधी अनुदान के बारे में क्या आयोग विचार करेगा?
विपक्षी दलों की सरकारों वाले राज्य इसको हटवाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें खतरा है कि ऐसा होने पर उनका राजस्व घाटे संबंधी अनुदान बंद हो सकता है। वित्त आयोग को यह भी निर्देश दिया गया है कि पिछले वित्त आयोग द्वारा राज्यों को टैक्स में ज्यादा हिस्सा मिलने के कारण केंद्र के राजकोष की स्थिति पर प्रभाव का अध्ययन करे और ‘न्यू इंडिया 2022’ समेत राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम की जरूरत के साथ इसे जोडक़र देखा जाये। राज्यों को लग रहा है कि इस शर्त के माध्यम से वित्त आयोग टैक्स में राज्यों के हिस्से को कम कर सकता है। जीएसटी लागू करने की कवायद में केंद्र सरकार ने राज्यों को यह वचन दिया था कि जीएसटी लागू होने से उनके टैक्स में होनेवाले नुकसान की वह न केवल पूरी-पूरी भरपाई करेगी, बल्कि उसमें 14 प्रतिशत ग्रोथ के साथ राजस्व की भरपाई भी होगी। इस वचन के कारण केंद्र सरकार का राजस्व बजट काफी बिगड़ गया है। वित्त आयोग को यह भी अध्ययन करने के लिए कहा गया है। विपक्षी दलों की सरकारों वाले राज्य चाहते हैं कि इस बाबत कोई संदर्भ वित्त आयोग में न रखा जाये। यूं तो राज्यों के बीच बंटवारे को सही ढंग से करने के लिए नवीनतम जनगणना का ही उपयोग औचित्यपूर्ण है, लेकिन सरकार द्वारा बिना कोई कारण बताये 1971 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल विशेषज्ञों को हमेशा अटपटा ही लगता रहा है।

14वें वित्त आयोग को इस संबंध में 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आंशिक रूप से इस्तेमाल करने की अनुमति मिली थी। इस बार सरकार ने 15वें वित्त आयोग की संदर्भ की शर्तों में 2011 के जनगणना आंकड़ों को इस्तेमाल करने का निर्देश जारी किया है। दक्षिण के राज्यों ने इसके लिए अपनी शिकायत दर्ज की है कि इस नयी शर्त के कारण उन्हें इसका नुकसान हुआ है और इसलिए इन सभी राज्यों ने इसके खिलाफ आवाज उठाना तय किया है। गौरतलब है कि भारत में वर्तमान में 21 राज्यों में भाजपा और उनके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि दक्षिण के राज्यों में एक में भी उनकी सरकार नहीं है, इसलिए अपने चहेते उत्तर के राज्यों, जहां उनकी सरकारें हैं, को फायदा पहुंचाने के लिए यह सारी कवायद की जा रही है। आसानी से समझा जा सकता है कि ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा धन की जरूरत होती है, ताकि लोगों के लिए बेहतर सेवाएं प्रदान की जा सकें और उन्हें गरीबी से बाहर लाया जा सके। हालांकि, विपक्षी दलों वाली राज्य सरकारें वित्त आयोग की संदर्भ शर्तों को बदलने की जोरदार मांग कर रही हैं, लेकिन केंद्र सरकार उसकी तरफ ध्यान देने के लिए तैयार नहीं दिख रही। हमें समझना होगा कि वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जो राजनीति से ऊपर है, जिसकी सिफारिशों को बिना कोई प्रश्न उठाये स्वीकार किया जाता रहा है। माना जाता है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संबंध एक रस्साकशी के समान होते हैं, जिसमें राज्य हमेशा यह प्रयास करते हैं कि उनको केंद्र से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा और अनुदान मिले, जबकि केंद्र सरकार की हमेशा यह मंशा रहती है कि राज्यों को उसे ज्यादा पैसा न देना पड़े।

लेकिन यह रस्साकशी केवल केंद्र और राज्यों के बीच में ही नहीं होती, बल्कि विभिन्न राज्यों के बीच भी होती है और प्रत्येक राज्य यह चाहता है कि राज्यों को मिलनेवाले कुल हिस्से में से उसका हिस्सा ज्यादा से ज्यादा हो। इस रस्साकशी में वित्त आयोग राष्ट्रपति द्वारा उसको दी गयी संदर्भ शर्तों के मद्देनजर अपने विवेक का प्रयोग कर अपनी सिफारिशें देता है। देखना होगा कि एनके सिंह की अध्यक्षता में 15वां वित्त आयोग इस खींचतान में कैसे सामंजस्य बिठाते हैं।

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