जिद… सच की

जहरीली शराब, मौतें और सरकारी तंत्र

सवाल यह है कि सरकारी ठेके में जहरीली शराब कहां से आई? क्या अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में सरकारी ठेके के जरिए अवैध शराब खपाई जा रही थी? क्या यह सारा खेल आबकारी विभाग और ठेकेदारों की मिलीभगत से चल रहा है? क्या ठेकों पर बेची जाने वाली शराब का परीक्षण करने का कोई इंतजाम नहीं किया गया है? इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?

कानपुर में देशी शराब पीने से दो दिन के भीतर 14 लोगों की मौत हो चुकी है। दो दर्जन से अधिक गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। इस मामले में पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया है। एक सप्लायर के घर से कई पेटी अवैध शराब और केमिकल बरामद किया गया है। सरकार ने मृतकों के परिजनों को मदद देने का ऐलान किया है। सवाल यह है कि सरकारी ठेके में जहरीली शराब कहां से आई? क्या अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में सरकारी ठेके के जरिए अवैध शराब खपाई जा रही थी? क्या यह सारा खेल आबकारी विभाग और ठेकेदारों की मिलीभगत से चल रहा है? क्या ठेकों पर बेची जाने वाली शराब का परीक्षण करने का कोई इंतजाम नहीं किया गया है? इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या सरकार को केवल ठेके से होने वाले लाभ से मतलब है? क्या जहरीली शराब पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकार जवाबदेह नहीं है? क्या ऐसी घटनाओं के लिए आबकारी विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार जिम्मेदार है?

प्रदेश में अवैध शराब का धंधा फल फूल रहा है। अधिकतर यह धंधा शहर के आस-पास के गांवों से संचालित किया जाता है। आबकारी विभाग के अफसरों से मिलीभगत कर कई बार देशी शराब के ठेके से अवैध शराब को खपाया जाता है। यह शराब सस्ती होती है और इसमें केमिकल का मिश्रण घातक तरीके से किया जाता है। ऐसी स्थिति में शराब पीने वालों की जान चली जाती है। कानपुर में एक सप्लायर के घर से बरामद अवैध शराब और केमिकल इसी ओर इशारा कर रहे हैं। मोटी मलाई के चक्कर में आबकारी विभाग के अफसर भी अवैध शराब के उत्पादन पर रोक लगाने से कतराते रहते हैं। अवैध शराब पर लगाम लगाने के नाम पर कभी-कभी अभियान चलाकर खानापूर्ति की जाती है। दूसरी ओर सरकारी ठेके में बिकने वाली शराब के परीक्षण में लापरवाही बरती जाती है। निगरानी व्यवस्था दुरुस्त नहीं होने के कारण शराब माफिया इन सरकारी ठेकेदारों से मिलकर लोगों की जान से खिलवाड़ करते हैं। बोतलों में असली ब्रांड का लेबल लगाकर नकली और जहरीली शराब धड़ल्ले से बेची जा रही है। कानपुर में भी यही हुआ है। इसकी पुष्टिï खुद अधिकारी भी कर रहे हैं। जाहिर है शराब के नाम पर लोगों की जान से खेलने का खेल खेला जा रहा है। यदि सरकार इस पर लगाम लगाना चाहती है तो उसे न केवल दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी बल्कि सरकारी ठेके में बेची जा रही शराब की नियमित निगरानी की व्यवस्था भी करनी होगी। इसके अलावा जो लोग इस खेल में शामिल हैं, उनको भी चिंहित करना होगा। यदि सरकार शराब के ठेके के जरिए आय कर रही है तो उसे लोगों की मौत की जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जा सकता है।

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