वाराणसी हादसे से सीख लेने की जरूरत

 संजय तिवारी

वाराणसी में जो दुर्घटना हुई उसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार है ? वह पुल सालों से बन रहा है। उसी रास्ते अनगिनत बार अनगिनत नेता, मंत्री, अफसर, इंजीनियर अवश्य गुजरे होंगे। वाराणसी के अलावा लखनऊ में भी ऐसे निर्माणाधीन अनेक पुलों से ये लोग आज भी गुजर रहे हैं। हर कहीं खुले में निर्माण चल रहा है। धूल, गर्द सब उड़ रही है। नीचे से लोग चल रहे हैं। ऊपर काम चल रहा है। शायद ही कोई निर्माणस्थल है जहां किसी प्रकार की सुरक्षा की गयी हो। आखिर इन जिम्मेदार लोगो को दुर्घटना से पहले क्यों नहीं दिखता कुछ ? किसी निर्माण स्थलों पर न तो सुरक्षा के मानकों का पालन हो रहा है, न ही आम आदमी की जान की परवाह की जा रही है। रिश्वत और भ्रष्टाचार ने सभी को किनारे लगा दिया है। यदि ऐसा नहीं होता तो जिस एमडी को अखिलेश यादव की सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया था, उसी को भाजपा की सरकार में फिर एमडी कैसी बनाया जाता ? लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती। जब दुर्घटनाएं होती हैं तो नीचे वालों के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है। ऊपर वाले मलाई खाते रहते हैं। शायद ही कोई हादसा ऐसा रहा हो जिसमे कोई बड़ी कार्रवाई हुई हो और हत्या के आरोप में कभी किसी को कोई सजा हुई हो। घटना होने के दो चार दिन बाद तक हल्ला-गुल्ला होता है और फिर सब यथावत चलने लगता है।

अपने देश में गर्डर गिरने की घटनाएं आम हैं। हर कुछ समय के अंतराल पर एक नए हादसे के हम गवाह बनते हैं। हर बार सबक सीखने की बात भी कही जाती है, पर अनुभव यही बताता है कि हमने कोई सबक नहीं सीखा है। अकेले उत्तर प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के भीतर करीब पांच ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जबकि इनसे आसानी से बचा जा सकता था। दुर्घटनाओं से बचने का कोई बड़ा अंकगणित नहीं है। इसके लिए जरूरत है, तो बस गर्डर रखने या ऐसा कोई भी काम करने के दौरान कुछ मामूली सावधानियां बरतने की। इसकी तकनीक भी उपलब्ध है और खर्च भी काफी कम है लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया जाता। यहां तो एमडी और चीफ बनने के लिए जुगाड़ फिट करने से ही अधिकारियों को फुर्सत नहीं है। यह भी सोचने की बात है कि हर थोड़े दिन पर मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्री से लेकर मुख्य सचिव, सचिव और स्थानीय प्रशासन के बड़े अधिकारी भी समीक्षाएं करते हैं। आखिर ये लोग किस बात की समीक्षा करते हैं ? इनकी समीक्षा में होता क्या है ? इनकी जिम्मेदारियां क्या हैं ? क्या वाराणसी के जिलाधिकारी और कमिश्नर को नहीं पता था कि उनके शहर में इस तरह के निर्माण हो रहा हैं ? सलीके से जांच हो तो सब नपेंगे, लेकिन यह घाघ नौकरशाही जांच भी तो सलीके से नहीं होने देती। कुछ दिन बीतते ही मामलों में फाइनल रिपोर्ट लगा कर यह सब पचा जाती है। इसकी पाचन शक्ति जो बहुत मजबूत है।

सवाल उठता है कि जब मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में घटना हुई तो डॉक्टरों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। अब बनारस के दोषियों के साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा है ? कुशीनगर में अवैध स्कूल और अवैध गाडिय़ां चलवाने वाले अफसरों को जेल क्यों नहीं भेजा गया ? हद तो तब हो गयी जब कुशीनगर में मरे बच्चों के परिजनों को जो चेक दिए गए वह भी बाउंस हो गए। यह तो बेहद शर्मनाक है। अगर समय रहते तमाम शिकायतों पर गौर किया जाता तो बनारस का यह हादसा नहीं होता। प्रोजेक्ट मैनेजर ने तीन महीने पहले खुद पर मामला दर्ज होने के बाद चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर को जो चि_ी लिखी थी, उस पर ध्यान दिया जाता, तो हाल यह नहीं होता।

प्रोजेक्ट मैनेजर ने बताया कि फ्लाईओवर निर्माण के चलते ट्रैफिक को आसान बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि ट्रैफिक पुलिस डिपार्टमेंट से उन्हें सहयोग नहीं मिल रहा है और ट्रैफिक पुलिस ने सेतु निगम के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है। विपरीत परिस्थितियों में मेरे लिए काम करना मुश्किल हो रहा है। इतने मानसिक दबाव में मैं काम करने में सक्षम नहीं हूं, क्योंकि इससे कार्यस्थल पर कोई अप्रिय घटना घट सकती है। बेहतर होगा कि इस प्रोजेक्ट से मुझे ट्रांसफर कर दिया जाए। के.आर. सूदन ने चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर को पत्र लिखा, ‘मैं एसएसपी वाराणसी से मिला और स्पष्ट किया कि जिस मामले में मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है उसमें मेरी कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद एसएसपी ने बात सुनने के बाद एफआईआर को खत्म करने का कोई विचार नहीं किया। उक्त घटनाचक्र से मैं काफी आहत और मानसिक दबाव महसूस कर रहा हूं। वर्तमान में निर्माण कार्य में रूचि ना लेकर मैं प्रकरण के समाधान हेतु कार्यवाही में व्यस्त हूं। कृपया मेरे मामले को बंद कराने की कृपा करें, अन्यथा इस प्रकार की विषम परिस्थितियों में बाकी काम को उसी लगन से कराया जाना संभव नहीं होगा।’ बनारस में यह सब हो रहा था। सभी अधिकारी इससे वाकिफ थे। ऐसे में अब भी किसी को बख्शने की जरूरत है क्या ?

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